जिला-कांकेर
विषय-चम्पू काव्य
शीर्षक-स्वच्छ पर्यावरण
*स्वच्छ पर्यावरण*
पृथ्वी की ऊपरी परत और उसमें पाए जाने वाले जीव -जंतु ,पेड़ -पौधे,चर ,अचर सब पर्यावरण के पूरक तत्व है।इसलिए पर्यावरण स्वच्छ बनाएं।हरियाली कोध्र का आभूषण बनाएं।
आज नदियाँ,झरने और पोखर सूखने लगे। लगते।प्लास्टिक से सरोवर भरा है।प्रदूषण के कारण ओजोन परत पर दुष्प्रभाव स्पष्ट दिखता है।इसलिए पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं।
पृथ्वी का आवरण ही
कहलाता पर्यावरण,
आओ पर्यावरण
स्वच्छ बनाएं,हरियाली बने
धरा का आभूषण।
झरने सूखे,नदियाँ सूखी
सूख गए पोखर,
जंगल की हरियाली छीनी,
प्लास्टिक से भरा सरोवर।
सूर्य की ज्वाला दहक उठी,
रूप बना विकराला,
प्रदूषण का बढ़ता स्तर,
ओजोन परत को बनाया निवाला।
हम है प्रकृति से
प्रकृति हमारी,
इसका करना है
हम सब को सम्मान,
पर्यावरण स्वच्छ हो,
परिवेश प्रदुषण मुक्त हो
ऐसा चलाएं अभियान।
जंगलों को विकास के नाम पर कभी काटा, कभी छांटा गया।पहाड़ों को काटा गया।प्रकृति का गलत तरीके से दोहन किया गया।इसलिए प्रकृति आज भूकम्प,सुनामी,महामारी के रूप में मानव संस्कृति का अंत करने पर उतारू है।
इसलिए आइए हम पुनः प्रकृति का श्रृंगार करें।प्रकृति की गुहार सुने और पेड़ लगाएं,जल बचाएं।धरती फिर हरी-भरी हो जाएगी। संसार में सुख-समृद्धि फिर छा जाएगी।
कभी छांटा,कभी काटा, विकास के नाम
पर खोदा पहाड़,
प्रकृति जा दोहन तुमने किया,
अब सुन लो उसकी
विकराल दहाड़।
कहीं भूकम्प,कहीं सुनामी,
कभी महामारी फैल रही
दुनियाँ में ये संकट भारी।
उठो जागो प्रकृति का
करो पुनः श्रृंगार,
जल बचाओ,पेड़ लगाओ,
प्रकृति की सुनो गुहार,
दुनियाँ फिर हरीतिमा से
भर जाएगी अपार,
सुख-समृद्धि से
भर उठेगा फिर संसार।
पृथ्वी का आवरण ही
कहलाता पर्यावरण,
आओ पर्यावरण
स्वच्छ बनाएं,हरियाली बने
धरा का आभूषण।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर (छ. ग.)..
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