जिला-कांकेर ,छग
शीर्षक-मजदूर
विधा-मुक्त छंद (पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार)
वह भागा -भागा आता,
फिर जाता काम करने
की ईच्छा जताता ,
करोना का टेस्ट करा लो
फिर आना सुन आवाक
रह गया रामू बेचारा।
बिना मास्क पहने नन्हें
बच्चों के खातिर वह
द्वार -द्वार काम की
तलाश में भटकने के
बाद नाउम्मीदी फिर
वही चिंता कल की।
तिल -तिल मरता वह
मजदूरी के भुगतान
की आस में साईकिल
ले जाता लौट आता,
लाक डाउन के खुलने
का इंतजार था उसे।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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