स्थान- डोलेसरा, तमनार
जिला- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विषय:- गरीबी
विधा :- मुक्त
अलंकार:-
$ *हाय गरीबी* $
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सिसक-सिसक कर दिन ढले,
रोज-रोज अरमान जले ।
कुच-कुच कर कुचले जाते, भूख की आग में कोस चले।।
दब-दब जाती भीड़ में चीख,
जर-जर तन को मिलती भीख।
हाय गरीबी जीवन है,
व्यथा मेरी ये देती सीख।।
जब-जब हमारे भाग जगे, तब-तब पूंजीवादी छले।
दो कौड़ी कीमत हमारी, गली-गली बोली लगे।।
टूट-टूट गिरता है छानी,
टप-टप टपकता है पानी।
ताल तलैया सड़के है,
कीचड़ से सजता है धानी।।
घुट -घुट कर जीना है,
गरल हीनता का पीना है।
बूंद- बूंद टपके है आंसू ,
धक -धक करता सीना है।।
पग- पग में लाचारी है,
पल-पल में बीमारी है।
नर्क भोगते हम बैठे है,
पीड़ा की चारदीवारी है।।
थर-थर करता जवानी हूं, मैला कुचैला कहानी हूं।
बन-बन बैल कोल्हू का,
घर घर खींचता घानी हूँ।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
Nice
ReplyDeletevry nice
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबेहतरीन अजय भैया बहुत मार्मिक वर्णन है
ReplyDeleteBohot khub
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