जिला-कांकेर
विषय-शहरीकरण से संबंधित रचना( सन्देह अलंकार का उपयोग करते हुए)
शीर्षक-गाँव शहर हो गया
*गाँव शहर हो गया*
मेरा गाँव देखो अब शहर हो गया,
कंक्रीट से सनी सड़क लगता है नगर हो गया।
बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं
शायद गगन चूमने चली,
नीम, तुलसी की जगह
कैक्टस उनींदी लगने लगी।
खेत ना खलिहान
ऊँचे-ऊँचे है मकान,
वट ना पीपल सारा
शहर विटप विहीन सुनसान।
यहाँ मिलती नहींमिठाईयां
पिज्जा बर्गर भर गए।
शहरीकरण के दौर में
सब शून्य सपाट हो गए,
हल ना बक्खर जे.सी. बी.
प्रधान हो गए।
उपजाऊ खेत नहीं बिल्डरों
के मकान हो गए,नगरीकरण अपनत्व को खा गया,इसे
आबाद कहूँ वीरान कहूँ।
विकास की गंगा बहने लगी,
नैनों की भाषा ना
समझ सका इंसान।
मेरा गाँव देखो अब
शहर हो गया,
कंक्रीट से सनी सड़क
लगता है नगर हो गया।
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व्याख्या-उपरोक्त कविता में शहरीकरण से होने वाले परिवर्तन को बताया गया है।ऊँचे, पक्के मकान,नीम, तुलसी की जगह कैक्टस ,यहाँ की परंपरागत मिठाइयों का स्थान बर्गर,पिज्जा ने ले लिया।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
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