Wednesday, June 10, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से गुलशन खम्हारी कि रचना- शहरीकरण

रचनाकार- गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला- रायगढ़ छत्तीसगढ़
संबंध-शहरीकरण एवं नगरीय विचारधारा
विधा- छंद मुक्त
अलंकार-"संदेह अलंकार"
शीर्षक-"सड़क पर इंसान"
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आधुनिकता का परचम गगन में लहराएगा,
दौड़ती भागती जिंदगी यूं ही खो जाएगा ।
सड़कों में जिंदगी या जिंदगी सड़कों में है,
मासूम सा परिंदा कुचला हुआ ही मर जाएगा ।।

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पहले पैदल चलते घोड़ा-हाथी होते थे,
इंसान जानवरों के संग-साथी होते थे ।
इंसान जानवर और जानवर इंसान हो गया,
कभी वक्त के आशियाने में दोनों हृदय प्रमाथी होते थे ।।

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कितना सुंदर रचना इंसान है,
शायद इंसान में ही भगवान है ।
द्रोपदी सी स्थिति है दुनिया की,
क्यों बन रहा भगवान इंसान है ?

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माता-पिता संग कितना सुंदर मेला था,
कदमताल से चलना थोड़ा झमेला था ।
भीड़ का इंसान है या इंसान का भीड़ है,
पर इंसान जन्म से अकेला है और अकेला था ।।

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जिंदगी महंगी और मौत सस्ती हो गई है,
चारों ओर श्मशान सी यह बस्ती हो गई है ।
इंसानों के बीच गड्ढा या गड्ढों में इंसान है,
इंसान गड्ढों में गिरी हुई कोई हस्ती हो गई है ।।

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चिमनियों के जलने से एक बड़ा बवंडर छा गया,
बिजली के कड़कने से कौन इसे खा गया ?
कोलाहल में माहौल या माहौल में कोलाहल है,
अंत समय में खुद के खोदे गड्ढे में समा गया ।।

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विशेष-
इंसान और भगवान, सड़क संग जिंदगी, जानवर-इंसान,इंसान- भीड़, इंसानों के बीच गड्ढे, तथा कोलाहल और माहौल में संदेह अलंकार का प्रयोग किया गया है । क्योंकि एक दूजे का हश्र समान प्रतीत हो रहा है ।

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 गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"

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