जिला_जांजगीर_चाम्पा
राज्य__छत्तीसगढ़
विधा---कविता
शीर्षक---गिरधारी के दोहे
व्याख्या____प्रस्तुत प्रथम दोहे में वर्तमान में जुताई के साधन के रूप में हल के घटते उपयोग उसके स्थान पर नये साधनों का प्रयोग खेती में हो रहे हानियों के बारे में बताया गया है ।
द्वितीय दोहे में किसान का फसल में रोग हो जाने के कारण उसका चेहरा बिगड़ा हुआ है कई प्रकार से रोकथाम के बावजूद उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है।
तृतीय दोहे में खेती को मानसून का जुआ कहा जाता था नहर के जाल बिछ जाने के कारण आज के समय में ऐसा कहना उपयुक्त नहीं है ।
चतुर्थ दोहे में नाम और काम से पहचान होती है अर्थ भेद से नहीं इसका वर्णन किया गया है ।
पंचम दोहे में धूप शब्द की व्याख्या किया गया है धूप शब्द गर्मी को इंगित करता है जिससे लोग दूर भागते है । दूसरा शबद धूप पूजन सामग्री जिसके जलाने से लोग आनंदित होते हैं दिन रात प्रतिक्षा करते रहते हैं ।
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हल से अब तो हल नहीं,जा रहे उसे भूल।
खेती संजीवनी था,परिश्रम लगे फिजूल ।
शकल बिगड़ा किसान का, करके सकल उपाय ।
कैसे हो फसल निरोग,........... कबसे छूटे हाय ।
खेती मानसून जुआ, .....कहते फिरते लोग ।
जुआ नहीं अब रह गया , मिटा नहर से रोग ।
रेशम रेशम इक लगे,भेद अर्थ बिन जान ।
एक ढकता तन सबकी, दूजे नाम बखान ।
थर कांपे सब धूप से,.... दूरी सदा बनात ।
मन आनंदित धूप से, प्रतिक्षारत दिन रात।
गिरधारी लाल चौहान
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