जिला:- रायगढ़ ,छत्तीसगढ़
विषय:- किसान
शिर्षक:- नई रेहे में किसान
अलंकार:- यमक
विधा:- गीत
*शब्दार्थ:-* यह रचना किसान के उस मार्मिकता का वयां कर रहा है, जिसका जमीन खदान के लिए अधिकृत हो चुका है। वह नया बसेरा की दुर्दशा और गाँव की यादों में खोकर रंजमय व्यथित मन से विवश होकर यह कह रहा है "मैं नई रेहे किसान"।
*नई रेहे में किसान*
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कुकरा बसता के बोली,
सुघर खेती अउ डोली।
नागर धर के तुतारी,
पेज बसता अउ झोली।
बिना सुरुज के लाली, हो जाहि गा बिहान।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
हरिहर खेती अउ खार,
भावे कोठी कोठार।
बारी झारी के भाजी,
भर भर लागे कछार।
पेड़ मा कइसे बनाओ गा मचान।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
चिखला माटी के रहईया,
डोली पार मा बुलईया।
परछी पीढ़ा सुहावै,
तरिया नरुआ के नहईया।
गरुआ कइसे करे सुना होंगे गा गोठान।
छइया भुइयां बेचागे ,नई रेहे में किसान।।
आनी बानी के तिहार,
सुघर बानी के पुकार।
घर मा भरे हावे अनाज,
सुखी जमो परिवार।
पुरखा ला मुहु कईसे,दिखावे गा सियान।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
पाका जामुन अउ बेर,
खावन संझहा के बेर।
रुंधना उजरगे जमों,
गदगे कोयला के ढेर।
करिया होंगे माटी खुदे गा खदान।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
उठगे देवता देवलास,
मरघट मा चिल्लावे लाश।
मिटगे चिन्हा चिन्हारी,
होगे जम्मो खल्लास।
छुटगे रिसता सबो,सुरता आये गा मितान।।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
डोली बनगे बजार,
बिखरगे जमो खेतिहार।
दर दर भटकत हाव,
लेके रुपया हजार।
धुत्कारत हे जमोझन,
काकर करो गा धियान।
छइया भुंइया बेचागे,नई रेहे में किसान।।
होंगे सुन सुखवासी,
छुटगे मोरे निवासी।
कोन्हा कगरा मा बसगे,
कहलाये में लवारसी।
गारी मार ला सुनके, हो गेयों गा उतान।
छइया भुइयां बेचागे,नई रेहे में किसान।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
बेहतरीन रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deletevry vry nice poem
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteबहुत सुंदर रचना अजय भैया
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
DeleteVery nice ji
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteगजब भाई अजय बहुत सुंदर रचना मोर भाई
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
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