स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--'विश्व शान्ति'
प्रेम - पीयूष भरा मन , हो श्रद्धामय कान्ति ।
समस्त सृष्टि के भीतर , व्याप्त हो विश्व शान्ति ।।१।।
शान्ति-सद्भाव नित रहे , लोगों के मन वास ।
अमन-चैन बढ़ाने का , प्रतिपल करें प्रयास ।।२।।
सहयोग-त्याग-तपस्या , मन में हो सुविचार ।
मानव जन्म पाये हैं , करना नित उपकार ।।३।।
मिट जाए अराजकता , लूट - खसोट तमाम ।
दंगा-फसाद-छल मिटे , अनाचार का नाम ।।४।।
स्नेह-सौहार्द्र नित बढ़े , बन्धुत्व भाव खूब ।
संवेदना सागर में , दुनिया जाए डूब ।।५।।
नक्सल - आतंकवादी , मिलकर करें विचार ।
देश हित में आगे रह , करें विश्व शृंगार ।।६।।
काल को गँवायें नहीं , सिरपर बैठा काल ।
न जाने कब ले जाए , पकड़ हमारा बाल ।।७।।
माया हम जोडें नहीं , करके छल भरपूर ।
मायाधीश की माया , करे गर्व को चूर ।।८।।
सो नर निश्चय पीर है , जो समझे पर - पीर ।
संवेदनामय दिल है , हुआ करता अधीर ।।९।।
जीने दो जियो तुम भी , छा जायेगी शान्ति ।
निश्चय सारे विश्व से , मिट जायेगी क्रान्ति ।।१०।।
जग में सब कोई रखें , जीने का अधिकार ।
छीन लेना है इसको , रहा अधर्म अपार ।।११।।
समभाव'ठाकुर'मन में , करेगा यदि निवास ।
तब सारे विश्व का है , हो सकेगा विकास ।।१२।।
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व्यख्या--विश्व में शान्ति स्थापना के उपाय का वर्णन।
काल=समय,मौत।पीर=सन्त,पीड़ा।माया=
धन,ईश्वरीय शक्ति=यमक अलंकार ।
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