स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छन्द मुक्त कविता(यमक अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"विश्व शांति"
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युगो से शांति की बहती धारा
इसका युगों तक चढ़ा रहा पारा
दिन बीते खल बसने लगे धरा
पुरातन में बसती थी जैसी काश
वैसी ही रह जाती परंपरा
तो इंसानियत होता ना मरा
आज छल कपट लोभ ने घेरा
पग- पग धर्म मजहब का डेरा
सरहद की दीवारें जग को बांटे
सुख शांति का हो गया कचरा
अब ना अमन चैन रिश्तो को बांधे
मार काट कर, कर ना काँपे
पुष्पा धर चिंता धर- धर नीर बहाए
ऐसा क्या हो जिससे शांति आए
महात्मा धर -धर जनम पाठ पढ़ाए
रे मानुष फिर भी समझ ना पाए
क्यों ना अवतरण ले कलह मिटाए
शांति दूत बन जगपिता शांति लाएं
विश्व शांति कल्पना तब रूप धरेगा
पुष्पा सह पुष्प सा विश्व महकेगा
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धर-पकड़ना, धरना,(धर-धर)तेज बहना, धरा-पृथ्वी,धारा-लहर
कर- करना, हाथ
पुष्पा-फूल,नाम
जग - संसार, भगवान
बेहतरीन लेख, उत्कृष्ट रचना
ReplyDeleteउत्कृष्ट रचना
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