जिला- बेमेतरा
विधा- मुक्त छंद कविता
शीर्षक- बचपन आज और कल
अपने बचपन के दिन,
होते थे क्या दिन।
दादा दादी संग रहते थे,
खूब कहानियां सुनते थे।
और गर्मी की छुट्टियों में,
नाना नानी के घर जाते।
सभी भाई बहन मिलजुल कर,
कई खेल खिलौने खेलते।
बहुत याद आते हैं हमको,
वो बचपन के दिन।
बहुत हंसाते बहुत रुलाते,
थे बचपन के वो दिन।
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आज का बचपन बोझ का बचपन,
कैसा है ये बचपन।
स्कूल की पढ़ाई से समय मिले तो,
ट्यूएशन का है टेंशन।
उसके बाद भी मोबाईल गेम भी,
चाहिए आज की बचपन को।
और समय मिल जाए तो,
कार्टून शो भी जरूरी है इसको।
इनको नहीं मिल रहा है,
दादा दादी का प्यार।
और ना ही मिल रहा है,
नाना नानी का दुलार।
तो फिर सोचने की बात है,
कौन भरेगा इनके जीवन में नैतिक शिक्षा अपार.......
सूर्य प्रकाश पाटिल
बहुत सुन्दर 👌
ReplyDeleteउत्तम लेख
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