निवास - पेंडरवानी ,बालोद ,छत्तीसगढ़
विधा - लेख
शीर्षक - बालोद अंचल
अविभाजित दुर्ग जिले का आदिवासीय सम्पर्क रखने और प्राकृतिक स्थलों से आच्छादित बालोद , डोंडी , डौंडी -लोहरा , गुरुर , गुंडरदेही क्षेत्र वर्तमान में एक जिला के रूप में सर्वगुण सम्पन्न है । जनवरी 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ में 9 जिलों का गठन किया । जिसमें 19वे क्रम का जिला बालोद है ।
12 जनवरी 2012 को डॉक्टर रमन सिंह जी के द्वारा उदघाटन पश्चात मातृ जिला दुर्ग से अलग होकर बालोद जिला का दर्जा प्राप्त किया । यहां पांच विकासखण्ड गुरुर , बालोद , डौंडी , डौंडी - लोहरा और गुंडरदेही है । बालोद जिले का मुख्यालय बालोद है जहां से सभी प्रशासनिक कार्य संपादित होता है ।बालोद का प्रथम कलेक्टर श्री अमृत खलको जी को एवं प्रथम एस .पी. श्री डी . एल . मनहर जी को बनाया गया ।जिनके जिम्मे नव बालोद जिले की बागडोर सौंपी गई।
बालोद की जीवन दायनी नदी तांदुला है । जिस पर मुख्यालय में ही विशाल अंग्रेजों के समय का तांदुला डेम स्थापित है । यंही से न केवल बालोद शहर बल्कि विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों के साथ बीएसपी (भिलाई इस्पात संयंत्र) को आवश्यक जलापूर्ति होती है । इसके अलावा खरखरा , गोंदली , नदी भी है। राजधानी रायपुर की जीवनदायनी नदी खारू का उदगम स्थल गुरुर विकासखण्ड के पेटेचुआ बालोद जिला में ही है।बालोद जिला के डौंडी विकासखण्ड पूर्ण वनाच्छादित है जबकि डौंडी -लोहरा, बालोद और गुरुर विकासखण्ड आंशिक रूप से वनों से घिरे है।गुंडरदेही विकास खंड वन के मामलें में गरीब है ।
प्राचीन स्मारक - बालोद जिला भी छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों की तरह प्राचीन स्मारकों का गढ़ है । यहां भी कई लोककथा , किवदंतीयां लोको में सराबोर है संस्कृति का अभिन्न अंग है।
मां बहादुर कलारिन की मांची - यह गुरुर विकासखण्ड के चिरचारी ग्राम में स्थित 6वी -7वी सताब्दी की राज घराने के एक अत्यंत गरीब पर सुंदर , सुशील , गुणवती बहादुर कलारिन के प्रति लगाव की गाथा है । किवदंति है कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात को चरितार्थ करती एक कलारिन युवती जो अपने मची में बैठकर मदिरा बेच करती थी जिस पर राजा मोहित हो गया और अपनी पटरानी बना लिया ।
जिनसे से उत्पन्न संतान अत्यंत बहादुर तो था पर कामी भी था । कालांतर में राजा का साम्राज्य का पतन हुआ और वे स्वर्ग सिधारे तो राज्य की जिम्मेदारी पुत्र पर आन पड़ी। उसे उसकी माता विवाह कर बंधन में बांधना चाही तो उसका पुत्र अपनी माता को ही संसार का सबसे सुंदर स्त्री बता
वासना जाहिर किया तो साध्वी स्वरूपी माता पुत्र को श्राप दे स्वर्ग सिधारी । तब से उसका पुत्र पाषाण में परिवर्तित हो गया। चिरचारी में आज भी पाषाण का खंडित युवक और मांची है । कलार जाति के लोग उस पर अपनी आस्था बनाये हुए हैं । यह स्थल माँ बहादुर कलारिन की मांची व स्मारक के लिए विख्यात है ।
पाषाण मूर्तियां - गुरुर के ही धनोरा ग्राम में 12वी सदी की पाषाण मूर्तियां व शिलालेख है ।
पाषाण स्मृति चिन्ह - बालोद विकासखण्ड के करकाभाट गांव में 12वी सदी का पाषाण निर्मित मृतकों के समाधि पर बनाये गए कई चौकोर स्मृति चिन्ह है।
गंगा मैया मंदिर झलमला बालोद -
बालोद जिला मुख्यालय से 5किलोमीटर दूर उत्तर की ओर झलमला ग्राम में प्रसिद्ध देवी मंदिर स्थापित है जिसे लोककथा किवदंतियो के अनुसार ही गंगा मैया के नाम से जाना जाता है ।जनश्रुति किवदंति है कि एक केंवट तालाब में मछली पकड़ने जाली डालता तब तब एक देवी मूर्ति हमेशा जल में फँसकर बाहर आता और केंवट उसे तालाब में डाल देता । फिर झलमला गांव के बैगा को स्वप्न आया कि मैं देवी की साक्षात स्वरूप हूं और जनकल्याण के लिए इस क्षेत्र में विराजित होना चाहती हूँ इसलिए तुम मुझे बाहर निकलवाकर प्राण प्रतिष्ठा करावो , तुम्हारा और इस गांव का कल्याण होगा । स्वप्न की बात बैगा ने गांव के मालगुजार और लोगों के बीच रखा फिर जनसहयोग से मंदिर बना प्राण प्रतिष्ठा की गई। आज भी अपने विशाल आकार एवं मनोवांछित फल देने वाली देवी के रूप में गंगा मैया झलमला क्षेत्रवासियों का ही नही बल्कि अलग अलग क्षेत्रो से आये पर्यटकों के लिए आ आँख का तारा अराध्य देवी है।
इनके अलावा और भी बहुत सारे मंदिर है जैसे रानीमाई , सियादेवी , कुकुरदेव , महामाया, जो अपने अपने क्षेत्र में जनमानस को आल्हादित कर सुखदायी बनी हुई है ।
बालोद जिला में दल्ली राजहरा बीएसपी के लिए आवश्यक कच्चा लोहा कई सालों से आपूर्ति कर रहा है । अब बैलाडीला से भी प्राप्त होता है । यहां वन की पर्याप्त भंडार होने से कई प्रकार के वनौषधियों, वनोपज का संग्रहण भी किया जाता है।इस तरह छोटा से जिला होने के बावजूद अपने गौरवशाली इतिहास और वन संपदा ,संस्कृति के लिए बालोद जिला राज्य में अपना अलग महत्व रखता है।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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