रचनाकार- गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़(छत्तीसगढ़)
विधा-संस्मरण
शीर्षक- "भूख का चक्रव्यूह"
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" *भूख का चक्रव्यूह*"
*विधा - संस्मरण*
उस रोज शुक्रवार का दिन था,मां संतोषी की व्रत आराधना में सपरिवार व्यस्त था । खासकर उपवास रहने वाली मां,जिन्हें घर का सारा काम करना पड़ता था । हवन के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर सब जाने लगे करीब 1 घंटे पश्चात,सहसा मां की नजरें एक कबूतर पर पड़ी जो शायद आंगन में दाना चुग रही थी, घर की मोटी तगड़ी बिल्ली जिसे आज सुबह से दूध नहीं मिला था,इस कबूतर को देख जीभ लफलफाते हुए इस पर झपट्टा मारकर दबोच लिया। गर्दन मुंह में चबाए बिल्ली मदमस्त हाथी के चाल में बलखाकर चलने लगी । उसकी आंखों में अजीब सी खुशी की चमक थी ।मां का मर्मस्पर्शी हृदय इसे देख न सका और हाथ में पकड़े प्रसाद को छोड़,बिल्ली को दौड़ाने लगी मां को दौड़ते देख मैं भी उनके पीछे कौतूहल से दौड़ने लगा । थोड़ी दूर जाने के बाद बिल्ली के मुंह से कबूतर छूट गया । अब उस घायल कबूतर को माताजी ने घर लाकर हल्दी से मरहम पट्टी किया पर कुछ देर बाद उसकी मृत्यु हो गई ।एक अनहोनी जानकर मां विलाप करने लगी । अंततः विलंब से ही सही, परंतु मां ने प्रसाद ग्रहण किया । घर के वरिष्ठतम सदस्य दादाजी, जो बरसों से कबूतर के मांस के लिए लालायित थे आज यह मौका नहीं छोड़ने वाले थे ।दबे पांव कबूतर को हाथ लिए वो उनके मांसाहारी चूल्हे की जुगत में लग गये और अंत में क्षुधाशांति प्राप्त किये । मैं इन सबको छिद्रान्वेषी नजरिये से देखता रहा माताजी-कबूतर-बिल्ली और दादाजी में एक भूख का चक्रव्यू नजर आ रहा था जिसमें सब अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने में लगे हुए थे कौन सही कौन गलत का निर्णय कर पाना मेरे लिए कठिन था । पर उपवास के बावजूद माताजी के प्रयास के लिए मन में उनके लिए सम्मान और इज्जत और बढ़ गया ।
गुलशन_खम्हारी
सुंदर संस्मरण
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