स्थान- बुलाकी पुसौर रायगढ़
विधा -संस्मरण
शीर्षक- "अभिभावक गुरुजी"
सन 1975 की घटना है मैं कक्षा 5 वीं की वार्षिक बोर्ड परीक्षा में दो पेपर लिखने के बाद बुखार आने के कारण परीक्षा में शामिल नहीं हो पाई और घर वाले भी उस समय परीक्षा पर ध्यान नहीं दिए उस समय पढ़ाई को उतना महत्व नहीं मानते थे। जिस दिन सामाजिक अध्ययन का पेपर था उसी दिन बुखार आने के कारण परीक्षा भवन में उपस्थति नहीं दे पाई। मेरी मां से परीक्षा देने जाने के लिए बात की मां मुझे एक घुड़की लगाकर शांत कर दी। मेरा मन परीक्षा के लिए लगा रहा लेकिन मैं क्या करती गांव में होता तो किसी भी तरह चली जाती लेकिन परीक्षा दिलाने के लिए मुझे 5 किलोमीटर सपोस गांव जाना होता था परीक्षा का समय 8:00 से 11:00 बजे था। कक्षा पांचवी में केवल 4 बच्चे थे। सभी पैदल जाते थे ।बुखार आने के कारण अस्वस्थ और कमजोर लग रहा था फिर भी मैंने हिम्मत कर रही थी। अगर एक बार माँ जाने के लिए अनुमति देते तो मैं परीक्षा दिलाने चली जाऊंगी। लेकिन मांँ के मना करने से नहीं जा पाई और खाट मे चादर ओढ़ कर लेटी थी मां और भैया महुआ बिनने और पिताजी बढ़ई का काम करने चले गए मां मेरे लिए रोटी और तुलसी मंजरी का अदरक का चाय बनाकर कांस के गिलास में रखकर पनपुरवा रोटी कपड़ा में लपेटकर खाट के नीचे रख कर चली गई ।दातुन करके खा लेना हम लोग जा रहे हैं ।जैसे ही घर वाले घर से बाहर निकले ही थे ,कि मुझे मेरी खोज खबर करने गुरुजी मेरे घर आ पहुंचे। देखकर मैं मायूस हो गई। गुरुजी बोले अरे बेटा क्या हुआ क्यों परीक्षा दिलाने नहीं गए, मैं गुरु जी को देखते ही डर गई और रूधे आवाज से बोलीे गुरु जी मुझे बुखार आ गया और मेरी मां जाने के लिए मना कर दी ।गुरुजी बोले बेटा आप बैठ पाओगे कि नहीं मैं बोली हां लेकिन मैं चल नहीं पाऊंगी ।गुरुजी बोले कोई बात नहीं आपको मैं साइकिल में बिठा कर ले जाऊंगा मैं हां गुरुजी बोली और तुरंत उठ कर दातुन कि चाय पी और लेट होने के कारण रोटी नहीं खाई ।मेरे बाल उलझे हुए थे गुरु जी मुझे देखकर मेरे बाल ठीक किए कपड़े उतरवाकर दूसरा कपड़ा पहना दिए और साइकिल में बिठाकर परीक्षा भवन की ओर चल पड़े जैसे ही सपोस पहुंचे गुरु जी मुझे एक होटल में बिठा दिए और होटल वाले से कह दिया कि इसे एक दो ना पकौड़ा दे देना और मुझे बोल कर गए कि थोड़ी देर में मैं आ रहा हूं ।थोड़ी देर में गुरु जी आप आ गए मैं पकौड़ा खा रही थी, मुझे देखते ही गुरु जी बोले कि जल्दी खाओ बेटा देर हो जाएगा और मुझे एक आनंद कर गोली दिए और एक गिलास पानी और बोले कि इस गोली को खाओ और पानी को पीओ । चलो जल्दी लेट हो रहा है मैं दवा खाई साइकिल में बैठे और परीक्षा भवन पहुंचे जल्दी बाजी में बसता ही भूल गई न गुरु जी को भी ख्याल रहा ।अब किस में लिखोगे गुरु जी बोले। मैं चुप थी। गुरुजी कहीं से मेरे लिए पुटठा का जुगाड़ कर दिए और अपना स्वयं का पेन दिए। जिसका कलर नीले रंग का था । मैं पेन और पुठा लेकर अपने स्थान पर चली गई वहां देखी तो सब कोई पेपर लिख रहे हैं। मेरे मन में लगा कि मैं कैसे लिख पाऊंगी सब कोई लिख रहे हैं मैं पिछड़ गई ऐसी सोच आने पर मुझे मायूस हो ग ईऔर मैं गुरु जी की तरफ देखने लगे गुरु जी मुझे इशारे से ढाढस बधाएऔर चुपचाप लिखने के लिए बोले मैं पेपर लेकर लिखने लगी समय समाप्त होने पर परीक्षा भवन से बाहर आए गुरुजी पेपर के बारे में पूछे मेरा पेपर अच्छा बना था गुरु जी खुश हो गए और बोले कि चलो अच्छा हुआ अब घर चलते हैं मैं गुरु जी को पुठ्ठाऔर पेन वापस की गुरुजी पुठ्ठा वापस ले लिए और पेन मुझे रखने के लिए बोले गुरुजी जैसे ही पेन को रखने के लिए मुझे बोले उस समय मेरे नन्हे मानसिकता में गुरु जी के प्रति अपने आप श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ा और उस पेन को देखकर मुझे गौरवान्वित महसूस हुआ मुझे ऐसा लगा कि मेरे गुरु जी मुझे बहुत बड़ी चीज दे दिए हैं। पेन को अच्छे से पकड़ कर रखी थी । गुरुजी का पेड़ खो ना जाए। यह पैन मेरे गुरुजी की याद दिलाती रहती है मेरे गुरु उस दिन मेरे लिए अभिभावक और गुरु दोनों का दायित्व निभाए। मेरे गुरु जी के प्रति में आज भी कृतज्ञता व्यक्त करती हूं और जब भी यह सुखद पल यादें आती है। तो मेरे गुरु जी के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव उमड जाता है। मेरे गुरु जी मुझे ही नहीं सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे। आज भी मेरे गुरुजी मुझे देखकर बहुत खुश होते हैं मेरे गुरु जी के प्रति कृतज्ञता और उनके चरणों में प्रणाम मेरे लिए मेरे गुरुजी ,गुरुजी ही नहीं "अभिभावक" भी थे।
उर्मिला सिदार रायगढ़
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