लैलूंगा, जिला-रायगढ़(छ. ग.)
विधा-भगवान जगन्नाथ पर कविता
शीर्षक- अनुपम तेरी लीला, अनुपम तेरी गाथा
अनुपम तेरी लीला,अनुपम तेरी गाथा
सम्पूर्ण जगत ये टेकता तेरे चरणों मे अपना माथा
जानकी बल्लभ की भूमि ये जगन्नाथ का वास
द्वापर में तज अपनी काया कलयुग में जगन्नाथ कहलाया
समुद्र तट पे मिला दारू का काठ, कोई ना उठा पाया
न कोई पाया काट,प्रभु की ये लीला ना कोई जान पाया
नील माधव बन जगत में यश फैलाया
बारहवीं सदी में निर्मित जनन्नाथ का धाम
युगों युगों से पूर्ण करती श्रद्धालुओं की मनोकामना
धरती का बैकुंठ है ये,बिष्णु का है यह धाम
ओड़िशा के राजा हो तुम, गजपति हैं उत्तराधिकारी
पुत्र हीन वंश है ये, पोषक पुत्र हैं राज्याधिकारी
विश्वकर्मा निर्मित तुम्हारी छवि है मनोहारी
बलभद्र जगन्नाथ के बीच सुभद्रा है विराजी
सबसे ऊंची मंदिर पर ध्वज तुम्हारा
लहराता पवन के विपरीत
समुद्र भी सर झुकता,रास्ते कभी न तुम्हारे आता
तुम्हारे महाप्रसाद का स्वाद जो एक बार चख ले
कभी ना भूल पाता, मानुष अवतार ये है प्रभु का
भोजन भी मनुष्य सा करता
हे कलयुग के स्वामी, हे अन्तर्यामी
अनुपम तेरी लीला अनुपम तेरी गाथा।
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