स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (मुहावरे के प्रयोग)
शीर्षक -"दीवारों के भी कान है होते"
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चुगल खोर चुगली करते
छोटी बात मोटी करते
इधर की बात उधर
और उधर की इधर करते
सुननेवाला कहता धीरे से बोल
दीवारों के भी कान हैं होते
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रिश्तों में दरार हैं पड़ते
आंगन में दिवार हैं उठते
भाई की पत्तियों में नहीं बनती
भाई भाई आपस में झगड़ते
सुननेवाला पड़ोसी कहता चुप
सुन दीवारों के भी कान हैं होते
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हेराफेरी में रहता मुलाजिम
पैसों के लिये है बिक जाता
पैसों का हिस्सा दे कर
साथी को भी उकसाता
पर गेट में गार्ड खड़ा होके
सुन चुपके से कहता
दीवारों के भी कान हैं होते
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ब्यापारी गड़बड़ी करते
करते समानों की हेरा फेरी
मिलावट से जनता लुटते
लाखों रुपये तिजोरी में भरते
उनके नौकर चुपके से कहते
दीवारों के भी कान हैं होते
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(ये उन इंसानों पर एक व्यंग है जो सब देखसुन कर भी आवाज नहीं उठाते और दीवार जैसे निर्जीव वस्तु की आड़ में अपने सही कर्तव्य से भागते फिरते हैं |)
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