लैलूंगा,जिला- रायगढ़
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक' -ये कैसी जिंदगी'
सोचती हूँ मैं अक्सर
जीवन क्या है?
भीड़ के कोलाहल में
चलते-फिरते लोग
जो अक्सर जीते तो हैं
पर शायद उन्हें भी जिंदगी
का अर्थ नही मालूम
बहुत कुछ मिलता है जीवन में
फिर भी लालसा नही मिटती
कुछ और पाने की हसरत
हमेशा रहती है दिल में
इस पाने और खोने की
कशमकश में गुजर जाती है जिंदगी
फिर भी लोग समझ नही पाते
क्या खोया और क्या पाया जीवन में
ये कैसी जिंदगी?
जहाँ हरपल मौत का एहसास हो
बीते हुए कल में जीने की चाह हो
और आने वाले कल का भय सा हो
जैसे निरसता में जिये जा रही हो जिंदगी
सोचती हूँ मै अक्सर इतनी बेजान
क्यूँ होती है जिंदगी?
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