जिला -कांकेर, छग
शीर्षक-रिश्तों के खातिर
विधा-मुक्त छंद
दुःख के कब बादल घिरे
नफ़रत के नागफनी उगे
मन में कितने कांटे चुभे
हम हर सितम सहते रहे
सिर्फ रिश्तों के खातिर
अपनों से कितने दूर गये
हालातों की तपिश सहे
कांटों के नित चुभन नये
जाने कितने वो दर्द सहे
पर आईने में ढलते गये
सिर्फ रिश्तों के खातिर
नन्हें परिंदों को पर देने
आशियाने को छप्पर देने
तिमिर के आगोश तले
पैरों में कैसे छाले पड़े
फिर भी हम अड़े रहे
सिर्फ रिश्तों के खातिर।
सपनों को तब बल मिला
परेशानियों का हल मिला
सहनशीलता का फल मिला
ख्वाबों को नया कल मिला
तिमिर को अब हटना पड़ा
सिर्फ रिश्तों के खातिर।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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