शीर्षक-*दरारें *
राज्य- नसाउ , बहामा
*दरारें*
मेरे ज़ेहन कि दिवार में
कुछ दरारें है
उनमे से ख्वाहिशों कि
छोटी छोटी चिंटीयॉं निकल आती है ।
मैं देखती रहती हूँ और
कोशिश करती हूँ ध्यान देने की
किस दरार से कौनसी
चींटी निकल कर आयी है ।
मगर थोड़ी हि देर में
चींटियों का मजमा
इतना बढ़ जाता है कि
सारी दिवार ही उनमें समा जाती है ।
चींटियाँ बेतहाशा भागती हुईं
एक दूसरे से टकराती हुईं
अपने मुक़ाम तक पहुँचने कि
मुकम्मल कोशिश करती रहती है
पर कामयाब नहीं होती ।
वे कभी उपर की ओर जाती हैं
कभी नीचे कि ओर
कभी दायें तो कभी बायें
भीड़ और कोलाहल में
वे अपनी दिशा ही खो देती है
उनकी इस तिलतिलाहट से
मैं भी उकता जातीं हूँ
झल्लाकर एक बड़े से ब्रश से
पुरी दिवार भर देती हूँ सफ़ेदे से
अब न कोई चींटी है
न कोई चरमराहट
न कुछ हलचल है न आहट
सुकून कि सफ़ेद चादर ओढ़े है ज़ेहन मेरा
लेकिन क्या वाक़ई में सुकून मंद है?
क्योंकी दरारें तो अब भी है
चीटीयोंभरी .....
वृंदा
जुन १५, २०२०
बहूत खूब शायरी
ReplyDeleteबहुत सुन्दर मिनू
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