Wednesday, June 17, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर कृत- संस्मरण

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रचनाकार  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांगाँव(छत्तीसगढ़)
शीर्षक  --  माँ की सूनी माँग
विधा  --    संस्मरण ।
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                              मैं जब भी अपनी माँ की सूनी माँग को 
देखता हूँ तो मुझे अतीत के उन लम्हों की यादें बरबस ही रुला देती है  ।
                          जब मेरी माँ ने  साल 2005 में  मेरी शिक्षाकर्मी वर्ग 02 की नौकरी लगी तब  नौकरी स्थल में जाने  के लिए और वहाँ रहने की तैयारी करने के लिए
माँ ने अपने गहन बेचने का फैसला कर ली ।
                              तब मुझे ये फैसला मंजूर ना था क्योंकि माँ के पास ज्यादा गहने नहीं थे ।मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा । परन्तु  माँ यह कह अपनी बात को उचित ठहराने लगी कि यदि तुम नौकरी पर चले जाओगे तो कभी भी आभूषण खरीदी जा सकती थी ।
                      उस समय किसी ने हमारी कोई मदद की ना कोई रिस्तेदार ना कोई चित परिचित लोगों ने , किसी ने आर्थिक रुप से सहयोग नहीं किये । तब माँ ने अपने गहने बेचने का निर्णय ली थी ।
                      इस समय मेरे डी एड के मित्र दिनेश निषाद सर ने मेरी आर्थिक रुप से सहयोग मंगने पर एक बार में कुछ राशि देने को तैयार हो गए । और मैने पैसे लेते समय इस वादे के साथ पैसा स्वीकार किया कि मेरी पहली तनख्वा जब भी मिलेगी । मैं आपकी उक्त राशि बा इज्जत वापस लौटा दूँगा ।
                      उस समय मेरी पगार की कुल राशि 3250 रुपये  जो काफी लगती थी । पेमेंट मिलते ही हमने वादे के मुताबिक मित्र का पैसा लौटा दिये तब तीन माह पश्चात पेमेंट मिली थी । दीपावली जैसे पर्व में सर जी के पिता पैसे लेना उचित नहीं समझ रहे थे । परन्तु हमने समय पर किये सहयोग का एवं हमारे वादे का  वास्ता देकर किसी तरह से राशि वापस लेने को तैयार कर सके ।
                      इस तरह समय गुजरने लगा । समय के साथ माँ के गहने खरीद कर वापस देने की बात सोंचता पर इसके पूर्व और कोई नयी आर्थिक समस्या खडी़ हो जाती ।
                    कभी इस तरह समय गुजरने लगा । समय के साथ माँ के गहने खरीद कर वापस देने की बात सोंचता पर इसके पूर्व और कोई नयी आर्थिक समस्या खडी़ हो जाती ।
                    कभी भाई की पढा़ई का खर्च तो कभी बहन की शादी का तो कभी घर बनाने की बात होने लगती । मगर कारण जो भी हो माँ के गहने वापस दिलाने की बात रह जाती थी ।
                    इसके पूर्व माँ ने मेरे लिए मुझे डी एड करने जाने के लिए अपने गहने बिक्री करा दी थी । परन्तु डी एड मेंप्रशिक्षण में बेमेतरा दो साल तक रहा उस समय मेरी सबसे प्यारी बडी़ बुआ समय समय पर मेरी बडी़ मदद किया करती थी ।जो बी एस पी स्कूल दल्ली राजहरा में शिक्षिका थी ।अब दो तीन साल से ज्यादा हो गये सेवानिवृत हो चुकी हैं।मैं बडा़ ही भाग्यशाली हूँ कि मेरी ऐसी बुआ है ।
                      हमेशा कोई ना कोई समस्या आ ही जाती पर माँ की गहने लेने की बात वहीं की वहीं धरी की थरी रह गयी । कुछ समय पश्चात अर्थात बाबू जी की मृत्यु हो गयी । जिससे हमारे हर से बाप कि छाया छिन गया ।ऐसे लगा जैसे हम अनाथ हो गए ।
                     अब मेरी माँ के सर से पिता के नाम का सिंदूर मिट गया । अब शायद कभी इस स्थिति में आर्थिक रुप से योग्य हो भी जाऊँ कि माँ के लिए गहने खरीद कर दे सकूँ ।पर मलाल ताउम्र पिछा नहीं छोडे़गी कि मैंने माँ का सोलह श्रृंगार कभी पूर्ण नहीं कर पाया ।
यह दुख हर बार मुझे कचोटता है मैं जब भी अपने माँ की सूनी कलाई और सूनी माँग को देखता हूँ ।।

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रचनाकार 
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प्रवीण कुमार ठाकुर
पतोरा , छुरिया , राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
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