Wednesday, June 17, 2020

छत्तीसगढ़ के रायपुर से एच एस अरमो"अरमान " कृत- संस्मरण

लेखक- एच-एस-अरमो"अरमान "
जिला- रायपुर
लेखन- संस्मरण
***साथी की मदद ****
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    मेरे जीवन की एक यादगार पल की दाँस्ता सुनाना चाहता हूँ ।जब मैं वर्ष 1972 में कक्षा आठवीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था ।किन्तु मेरे मोहल्ले में रहने वाला साथी को जो कि हमारे स्कूल में पढ़ता था ।अपितु उसकी कक्षा आठवीं ही थीं पर उसका सेक्शन "ब"और मेरा "द" था ।इस परीक्षा में उसे गणित विषय में पूरक आ गईं थी और वह मुझसे बात करना बंद कर दिया था ।चूंकि मेरा घर उसके घर से आगे था और उन लोगों को मेरे घर के सामने से ही सारे काम करने के लिये गुजरना पड़ता था ।एक दिन की बात है कि हमारा अचानक आमना-सामना हो गया और मैंने साहस जुटाकर उससे पूछा कि तुम्हारा परीक्षा का रिजल्ट क्या रहा,तो वह मायूस- सा चेहरा बनाते हुए कहा कि अरे यार क्या बताऊँ गणित का पेपर तो मैंने पास होने के लायक प्रश्न हल किया था पर मुझे पसिंग मार्क 33के बजाय सिर्फ़ 22मार्क मिलें हैं,तुम ही बताओ ना मैं क्या करूँ--मैंने कहा कोई बात नहीं मेरी कापी में पूरी प्रश्नावली के प्रश्न हल किये हुए हैं,उनको देखकर बनाते रहना,पर थोड़ा खुश हुआ और कहने लगा कि कुछ प्रश्नावली के गणित तो मुझे बिलकुल समझ में नहीं आते हैं --?मैंने कहा कोई बात नहीं जो प्रश्न हल करते बनता है उसका अभ्यास करते रहना बाकी तुम मेरे पास आओगे तो समझा दूँगा ।एक दिन शरमाते हुये हमारे घर आया और माँ से मेरा नाम लेकर पूछने लगा कि वह घर है क्या--? माँ उस समय कुछ काम कर रहीं थीं उन्होंने वहीं से बोला कि जाओ वह अपने कमरे में बैठा कुछ कर रहा है।उसने अपनी चप्पल बाहर उतारी और सहमे हुये मेरे पास आया और कहने लगा कि क्या बताऊँ मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है और बहुत डर लगता है कि कहीं मैं फेल न हो जाऊँ ,मैंने कहा तुम खड़े क्यों हो,आओ इसमें बैठो और वह बैठ गया ।उसके बाद मैंने,उसके लिए एक गिलास पानी लेकर आया और उसे दिया तो उसने एक साँस में पानी को गटक लिया ।फिर मैंने कहा कि अच्छा बताओ कौन सी प्रश्नावली पूछना चाहते हो--?उसने कहा कि तुम ही अपने मन से बता दो ना,मैंने कहा ठीक है ।फिर मैंने कहा कि रेखागणित थोड़ा सरल है ताकि तुमको जल्दी समझ में आ जाएगा,उसने कहा--जैसी तुम्हारी मर्जी,मैंने कहा--ठीक है भाई ! मैंने कुछ रेखागणित की सरल -सरल परिभाषाएँ बताई और कुछ समझ में आ रहा है--?उसने कहा कि,क्या इतना आसान था,मैंने तो इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था ।फिर कुछ कोणों को बनाने का तरीका बताया और कहा इसको अच्छी तरह से बनाकर देखना ताकि इसी के आधार पर साध्य बनते हैं कि पढ़ाई करेंगे ।मैंने उसके चेहरे की ओर देखा तो मुझे कुछ तसल्ली हुई कि उसे कुछ समझ तो आ रहा है और यदि ऐसी तैयारी करते रहेगा तो अवश्य ही पास हो जायेगा ।मैंने उससे पूछा कि परीक्षा का फार्म भर दिया,तो उसने कहा कि कल जाऊँगा ।माँ से ही पैसे मान्गुगा बाबूजी से तो बहुत डर लगता है,मैंने कहा ठीक है,हो भूलना मत,उसने जाते -जाते हाँ में अपना सिर हिला दिया ।मैंने कहा ऐसे ही पूछते रहना तुम अवश्य पास हो जाओगे ।वह दरवाजे तक पहुँच गया और अपनी चप्पल पहनने के बाद चले गया ।
     फिर जब भी मन होता वह अपनी कठिनाई पूछता रहा ।उसकी पूरक परीक्षा एक माह बाद होने वाली थी ।उसने बहुत मेहनत की जिसके कारण वह पूरक परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया ।वह एक दिन घर आया,आते ही मेरी माँ के पाँव छुये और कहा मैं पास हो गया हूँ और माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम सदा ऐसे ही मुस्कुराना और आगे बढ़ते रहना ,जाओ आपका दोस्त अन्दर है उसे भी बताओ --?समय बीतते गया और कक्षा नवमी में उसे अंकों के आधार पर कला समूह में प्रवेश मिला और मुझे अच्छे अंकों के आधार पर विज्ञान समूह में मिला ।
  स्कूल की पढ़ाई पूरी हुई ।उसी वर्ष पिताजी का ट्रांसफर दुसरे शहर में हो गया ।वह उसी शहर में पढ़ने लगा और मैं अपने शहर में ।कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई और मेरी सरकारी नौकरी शिक्षक के रूप में लग गई और वह कुछ साल बेरोजगार रहा ।उसके बाद उसकी भी नौकरी सहकारी बैंक में कैशियर पद के लिए लग गयी थी ।आज वह रिटायर्ट हो गया है ।किन्तु पहले जब भी मिलता था तो कहा करता कि तेरे कारण ही मैं आज एक अच्छी नौकरी और काबिल आदमी बन सका हूँ ।मैं तेरा अहसान कभी नहीं भूलूंगा ।मैंने उससे कहा कि ये तो तेरी मेहनत और लगन का कमाल है,तुम अपनी इच्छा से मेरे पास नहीं आते तो मैं कैसे तुम्हारा सहयोग कर पाता ।मैंने कहा ये सब तुम्हारी दृढ़-इच्छा और आत्म-विश्वास से ही संभव हो सका है ।आज उसके बेटा-बेटी भी काबिल आदमी बन गये और उनकी शादी भी हो गयी है ।मुझे उसकी कही गयी बात आज भी याद आती है जबकि मैंने तो एक दोस्त के नाते उसे सहयोग किया था ।मैंने उस समय कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा एक छोटा सा प्रयास उसका भविष्य उज्जवल करने का एक सशक्त माध्यम बन गया था ।
  **********इति ***********
शिक्षा:--इस संस्मरण को मैं पहली बार आपके समक्ष प्रस्तुत किया है ।इससे हमें यही सीख मिलती है कि मानव को नी:स्वार्थ भाव से किसी का भी सहयोग करना चाहिए ।बल्कि यह 
सोच के ना करें कि इससे मेरा क्या फायदा होगा ।भविष्य में किसी के भी जीवन में ऐसा अवसर आता है तो उसे भी नि:स्वार्थ भाव से सेवा देने का प्रयास करना चाहिए ।
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मौलिक प्रस्तुति:-एच-एस-अरमो"अरमान "
    रायपुर छ.ग-
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