जिला----- जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़
विधा-----कविता
शीर्षक---- कहावत
व्याख्या-----कवि के द्वारा दीवारों के भी कान होते हैं इसको शाला के प्रधान पाठक के द्वारा व्यक्त करना विद्यालय के एक नन्हीं छात्रा के द्वारा घर में जाकर अपनी मम्मी को बताना फिर मम्मी के द्वारा समझाया गया है कि इसका मतलब कुछ और है यह एक प्रचलित मुहावरा है जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को गुप्त बातें बताता है और आपस में किये बातचीत का भेद न खुल जाये कहकर धीरे से बोलने के लिए कहा जाता है । और वास्तविक में दीवारों के कान नहीं होते ।
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कहावत
एक नन्हीं सी गुड़िया ।
शाला से घर आई ।
आकर अपनी मम्मी से ।
यह बात बताई ।
सुन सुन प्यारी मम्मी ।
एक बात तुम्हें सुनाऊं ।
जो शाला में कहानी सुनी ।
उसको मैं दुहराऊं ।
बड़े सर कह रहे थे ।
हम चुपचाप सुन रहे थे
दीवारों के भी कान होते हैं ।
कह कह हंस रहे थे ।
चलिए मम्मी बताना कान ।
आंख ,मुंह भी देखूंगी ।
सब देखकर आना कहें हैं ।
जाकर शाला बताऊंगी ।
मम्मी भी सुन हंस पड़ी ।
बच्ची अपने जिद में अड़ी ।
मम्मी फिर समझायी उसको ।
टल गई मुश्किल घड़ी ।
यह एक कहावत है ।
कहते फिरते लोग इसे ।
कही बात कोई सुन न ले ।
भेद न खुले कहते ऐसे ।
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