Tuesday, June 16, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- दीवारों के कान

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
जिला-कांकेर
शीर्षक-दीवारों के भी कान होते है


*दीवारों के भी कान होते है*
दीवारों के भी कान होते है,

जग में उलझे इंसान होते है।

देख-संभल कर चलो लोगों के बोएं नफरत के दुकान होते है,

ईर्ष्या, द्वेष से भरे घर-बार,संग सूना श्मशान होता है।

तुम मानों चाहे मत मानों कुछ तो पक्के ईमान वाले होते है,

जिंदगी की किताब कोरी है ,मगर पन्नों पर निशान होते है।

चलते-चलो राहें लंबी मगर हर कदम आसान होते है,

मैं खरीदने चला ममता को,मगर क्रेता नादान होते है।

तुम्हें लगता है मैं खुशनुमा रही हूँ सफर का,

मगर तुम्हें क्या पता वो भी परेशान होते है।
गम की परछाइयां भी गर हट जाएं,

उन जख्मों के बने पुराने निशान होते है।
दीवारों के भी कान होते है,

जग में उलझे इंसान होते है।

 व्याख्या-उपरोक्त कविता में मनुष्य को सतर्क रहने कहा गया है।संसार में फैले राग,द्वेष,नफरत के बारे बताया गया है।

    नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

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