जिला :- महासमुंद
विधा :- मुक्त छंद
शीर्षक:- दीवारों के भी कान होते हैं।
अक्सर सुना है लोगों से,
कि दीवारों के भी कान होते हैं।
तभी तो बातें रहस्य की,
जग में बखान होते हैं।
मगर मन में यह प्रश्न उठता है,
क्या दीवारों के मुख भी होते हैं?
या होते हैं उनके हाथ,
और वो पढ़े लिखे होते हैं।
क्योंकि कान तो गूंगों के भी होते हैं,
मगर बात तो अक्सर लिख कर ही कहते हैं।
तो फिर कान होने पर भी,
बिना हाथ और ज्ञान के भला,
क्या कुछ वो जतला पाते?
भले सुन लेते राज सब की,
मगर भला क्या बता पाते?
तभी मन में नवल विचार आता है,
कि क्यों न बदले मुहावरा।
देने लग जाएं लोगों को,
अब अलग ही मसवरा।
ना कहें कि हम अब लोगों से,
कि दीवारों के भी कान होते हैं।
जब कहनी हो बातें अहिस्ता से कहो,
तो हम यह कहें हर जन से,
दीवारों के कान के साथ हाथ होते हैं।
एक और बात यह भी की,
दीवार पढ़े लिखे भी होते हैं।
व्याख्या :- रचनाकार ने उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से जग प्रचलित मुहावरा "दीवारों के भी कान होते हैं" पर व्यंग्य भाव से सवाल करते हुए कहते हैं कि इस मुहावरे में सुधार की गुंजाइश है। इसे सुधार कर अगर हम यह कहें कि "दीवारों के कान के साथ हाथ भी होते हैं, और वो पढ़े लिखे होते हैं।" तो भाव ज्यादा बेहतर स्पष्ट हो पाएगा। यह रचनाकार की कल्पना मात्र है।
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