रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- शहरीकरण
विधा -- कविता छंद मुक्त
रस -- संदेह अलंकार
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शहरीकरण बढा़ जब से ,
प्रदुषण बढा़ है तब से ।
बढ़ रहा ह अत्याचार ,
बढ़ रहा है पापाचार ।।
नगरीकरण का प्रभाव बढा़ है ,
गाँवों में जनसंख्या घटा है ।
पाश्चात्य का रंग जन चढा़ है
शहरों में जनसंख्या बढा़ है ।।
स्वदेशी संस्कृति नाश हो रही है ,
परदेशी का देश में विकास हो रही है ।
नैतिकता का जन में हो रहा है हास ,
अपने ही कर रहे हैं निज उपहास ।।
लड़के लड़कियों में अब भेद नहीं है ,
गलती पर अपने इन्हें कोई खेद नहीं है ।
लड़के पहने कान में बाली ,
सिर पर बाल चोटी लड़कियों वाली ।।
लड़कियाँ पहने हैं जींस शर्ट ,
और कपडे़ पहनते हैं लड़कों वाली ।
लड़कियाँ करते हैं मदिरा पान ,
नैतिकता का पडा़ हुआ है आकाल ।।
ऊँची सैन्डल ,नीची चाल ढाल ,
नखरे बडे़ हैं , करे बडा़ कमाल ।
होती जा रही भारतीय संस्कृति है ,
पाश्चात्य पूर्ण , प्रदुषित संस्कृति है ।।
अपनों द्वारा गैरों की अपनाई रीति है ,
अपनों के जहन में फैली कुरीतिहै ।।
होता नहीं लड़के लड़कियों की पहचान ,
देख के भी नहीं होती है इनकी पहचान ।।
एक से पहनावा हुए है ,बदली है इनकी चाल ,।
वक्त बदल रहा है ,देखो क्या क्या करे कमाल ।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
पतोरा , छुरिया , राजनांदगाँव (छ.ग.)
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