Wednesday, June 10, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- शहरीकरण

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रचनाकार  -- प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला  -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- शहरीकरण 
विधा  -- कविता छंद मुक्त
रस  --  संदेह अलंकार 
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शहरीकरण बढा़ जब से ,
               प्रदुषण बढा़ है तब  से ।
बढ़ रहा ह अत्याचार , 
               बढ़ रहा है पापाचार  ।।

नगरीकरण का प्रभाव बढा़ है ,
               गाँवों में जनसंख्या घटा है ।
पाश्चात्य का रंग जन चढा़ है
               शहरों में जनसंख्या बढा़ है ।।

स्वदेशी संस्कृति नाश हो रही है ,
     परदेशी का देश में विकास हो रही है ।
नैतिकता का जन में हो रहा है हास ,
     अपने ही  कर रहे हैं निज उपहास ।।

लड़के लड़कियों में अब भेद नहीं है ,
    गलती पर अपने इन्हें कोई खेद नहीं है ।
लड़के पहने कान में बाली ,
        सिर पर बाल चोटी लड़कियों वाली ।।

लड़कियाँ पहने  हैं जींस शर्ट ,
       और कपडे़ पहनते हैं लड़कों वाली ।
लड़कियाँ करते हैं मदिरा पान ,
          नैतिकता का पडा़ हुआ है आकाल ।।

ऊँची सैन्डल ,नीची चाल ढाल ,
          नखरे  बडे़  हैं ,  करे  बडा़  कमाल ।
होती जा रही भारतीय संस्कृति है ,
          पाश्चात्य पूर्ण , प्रदुषित संस्कृति है ।।

अपनों द्वारा गैरों की अपनाई रीति है ,
         अपनों के जहन में फैली कुरीतिहै ।।
होता नहीं लड़के लड़कियों की पहचान ,
    देख के भी नहीं होती है  इनकी पहचान ।।

एक से पहनावा हुए है ,बदली है इनकी चाल ,।
 वक्त बदल रहा है ,देखो क्या क्या करे कमाल ।

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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर 
पतोरा , छुरिया , राजनांदगाँव (छ.ग.)
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