जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *काश तुम*
विधा-मुक्त छंद
काश तुम कानन होते,
हिरनी मैं बन जाती।
वन में यूं कुलांचे भरती,
कस्तुरी महक फैलाती।
काश तुम राहगीर होते,
कल्पतरु मैं बन जाती।
सुस्ताने तुम आते तब,
ठंडक तुम्हें पहुंचाती।
काश तुम पुस्तक होते,
पाठक मैं बन जाती।
जब मर्जी मैं पढ़ा करती
सहेज तुम्हें रख पाती।
काश तुम बादल होते,
पंख मैं बन जाती।
मेघदूत बनकर द्वय
विरह तपिश मिटाते।
काश तुम संवेदना होते,
स्पंदन मैं बन जाती।
अनकही समझ जाते तुम,
मैं आंसू क्यों बहाती।
काश तुम कान्हा होते,
राधा रानी मैं बन जाती,
नेह की गगरिया भरती,
तुम प्रेम की मुरली सुनाते।
काश तुम प्रेम -पंछी होते,
मैं शांतिदूत बन जाती।
मानवता के गीत गाते,
ये धरा स्वर्ग कहलाती।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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