जिला महासमुन्द
विषय :- नशा : सामाजिक बुराई
विधा :- कविता
अलंकार :- सभंग यमक अलंकार
शीर्षक :- ना करो कभी नशापान
नशा नाश का कारण हैं,
करे नाश जीवन का मूल।
तनिक नशा का सेवन कर,
भूले मनु निज का उसूल।
उ सूल ऐसे चुभते उर में,
जो करे कोई मद्यपान।
भोले का प्रसाद मान कर,
किया चिलम का विधान।
वि - धान को बेंच - बेंचकर,
करे अर्थ का जुगाड़।
नशा पान के सेवन से लेते,
किसान कि शान बिगाड़।
नशा पान लोगों के लो गो,
करता बड़ा ही क्रूर।
मती लोगों की भ्रष्ट करता,
रिश्तों से करता दूर।
करजोरि कहे जोगी जी,
ना करो भैया मद्यपान।
नशापान अभिशाप जीवन को,
ना करो कभी भी नशापान।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने नशापान करने वालों को संबोधित करते हुए कहा है कि नशापान जीवन के लिए अभिशाप है अतः नशापान से बचें।
रचनाकार ने कविता के अलंकरण के लिए सभंग यमक अलंकार का प्रयोग किया है।
No comments:
Post a Comment