Friday, June 26, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- नशा नाश की मूल है

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--बंजारी , जिल
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--' नशा नाश की मूल है '


नशा  नाश की  मूल  है , होती अति  बेकार ।
आयु कमकर पहुँचाती , शीघ्र  ही  नर्क द्वार ।।१।।
नशा   सेवन  करने  से , तन होता कमजोर ।
कई  रोग  जकड़  लेता , पीड़ा   देता   घोर ।।२।।
नशा  कैंसर  की  माता , मान  रहा   संसार ।
आँख खोल के  रखे हैं , हमारे   आविष्कार ।।३।।
नशा से  अल्सर  होता , कष्ट अनेक  प्रकार ।
आलस-अनिद्रा- ऐंठन , करते  तनपर  वार ।।४।।
नशा  भूख को  मारती , घटाते   रही    खून ।
मुख मालिन्य हो जाता , दिनपर दिन है दून ।।५।।
नशा  में   चौपाये - सा , बन  जाते   विद्वान ।
करती नष्ट  विवेक को , बना   देती  अज्ञान ।।६।।
नशा के कारण  से  ही , बिगड़ रहे व्यवहार ।
इसके  चलते  आज है , टूट   रहे    परिवार ।।७।।
नशा पान  से  बढ़ा  है , अपराध  भी अपार ।
चोरी - हत्या  - डकैती , बढ़  रहा  अनाचार ।।८।।
नशा नष्ट किया करती , दौलत का  भण्डार ।
खेत आभूषण  बिकते , बिक जाते घर-द्वार ।।९।।
नशा ठीक  नहीं  होती , इसमें  न  ही सुधार ।
पाता न ही  सुख कोई , न  ही उसकी उबार ।।१०।।
नशा  के  कई  रूप हैं , शराब  कई   प्रकार ।
तम्बाकू - गुड़ाखू  सह , अफीम गाँजा-प्यार ।।११।।
नशा छोड़ो'ठाकुर'कह , खुद का करें सुधार ।
भारतमाता      हमारी , करती  यही  पुकार ।।१२।।
                     ०×××××××०
व्याख्या--नशा के हानिकारक विभिन्न पहलुओंपर
              प्रकाश डालने एवं दोहा क्रमाँक--१० में
              सभंगपद यमक पिरोने का प्रयास किया
              गया है ।

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