स्थान--बंजारी , जिल
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--' नशा नाश की मूल है '
नशा नाश की मूल है , होती अति बेकार ।
आयु कमकर पहुँचाती , शीघ्र ही नर्क द्वार ।।१।।
नशा सेवन करने से , तन होता कमजोर ।
कई रोग जकड़ लेता , पीड़ा देता घोर ।।२।।
नशा कैंसर की माता , मान रहा संसार ।
आँख खोल के रखे हैं , हमारे आविष्कार ।।३।।
नशा से अल्सर होता , कष्ट अनेक प्रकार ।
आलस-अनिद्रा- ऐंठन , करते तनपर वार ।।४।।
नशा भूख को मारती , घटाते रही खून ।
मुख मालिन्य हो जाता , दिनपर दिन है दून ।।५।।
नशा में चौपाये - सा , बन जाते विद्वान ।
करती नष्ट विवेक को , बना देती अज्ञान ।।६।।
नशा के कारण से ही , बिगड़ रहे व्यवहार ।
इसके चलते आज है , टूट रहे परिवार ।।७।।
नशा पान से बढ़ा है , अपराध भी अपार ।
चोरी - हत्या - डकैती , बढ़ रहा अनाचार ।।८।।
नशा नष्ट किया करती , दौलत का भण्डार ।
खेत आभूषण बिकते , बिक जाते घर-द्वार ।।९।।
नशा ठीक नहीं होती , इसमें न ही सुधार ।
पाता न ही सुख कोई , न ही उसकी उबार ।।१०।।
नशा के कई रूप हैं , शराब कई प्रकार ।
तम्बाकू - गुड़ाखू सह , अफीम गाँजा-प्यार ।।११।।
नशा छोड़ो'ठाकुर'कह , खुद का करें सुधार ।
भारतमाता हमारी , करती यही पुकार ।।१२।।
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व्याख्या--नशा के हानिकारक विभिन्न पहलुओंपर
प्रकाश डालने एवं दोहा क्रमाँक--१० में
सभंगपद यमक पिरोने का प्रयास किया
गया है ।
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