Wednesday, June 10, 2020

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से तारा पांडेय "मुक्तांशा" की रचना- शहरीकरण

तारा पांडेय "मुक्तांशा"
बैकुंठपुर, जिला_ कोरिया छत्तीसगढ़।
विषय_शहरीकरण
विधा_कविता
शीर्षक_ सहर गांव का.. 

मृगमरिचिका बना ये मन
भटका यूं वन, उपवन
फिर बसाया गांव सुनहरा
जहां हरियाली का पहरा
जीव जंतु,पक्षी और इंसान
रहते एक दूजे के कदरदान
खेती किसानी बड़ी अनोखी
दूध, दही की गंगा बहती
भारत बनी सोने की चिड़िया
दुनिया में इसकी सुगंध महकी
रिश्ते नातों में सिमटा संसार
सबको मिलता प्यार, सम्मान
प्रकृति भी खुश, जनमानस भी
था, चैन, शुकून और आनंद भी
पर बदला रुख, बढ़ी महत्वाकांक्षा
क्यूं न बदला जाए, प्रकृति का स्वरूप
उसको ढाला जाए, स्वयं के अनुरूप
जंगल काटा, पेड़ उजाड़े
रौंद दिया जो आया आड़े
कारखानों से सजाया शहर
बड़ी बड़ी इमारतों में
उसे याद ही नहीं आया
अपने गांव का डगर
दिखावे की दुनिया में भाया
उसको क्रैज और फैशन
भूल गया अपनी ही संस्कृति
का करने पालन
धन दौलत की चकाचौंध
चमक चांदनी उसकी हो गई
ग्रामीण जीवन अब उसके लिए
हाय भूली बिसरी हो गई
खाना तो केवल मांसाहारी
शाकाहारी खो गई
ना छोड़ा उसने गौ माता को भी
आहार अपना बना लिया
सांप, चमगादड़ तक न छोड़े
सबको भोजन बना लिया
अब ओ दिन दूर नहीं जब
मानव, मानव को ही खाएगा
कोरोना तो अब आ ही गया है
देखते हैं कैसे जाएगा
अब नहीं भा रहा शहर
क्योंकि वहां है बरपा
आत्मघाती कोरोना का केहर
अब याद आ रहा ओ
मेरा गांव, पीपल का छांव
ओ तुलसी का पौधा,
ओ अदरक की चाय, ओ, हल्दी का काढ़ा
ओ मेरी संस्कृति, ओ हांथ पैर धोने का रिवाज,
हांथ जोड़कर प्रणाम करने का अंदाज
अब मन कह रहा, थोड़ा रुक जा
ओ शहर, जाना है मुझे अपने
गांव, अपने घर
रहना है मुझे अब वहां
पहर दर पहर
मिली है मुझे यह खबर
होने वाला है गांव का
अब पुनः सहर जो गया था
कहीं गुमनाम सा ठहर..

   तारा पांडेय"मुक्तांशा"

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