स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }'
विधा--दोहा छन्द ,
शीर्षक--'शहरीकरण का आकर्षण' ।
शहरीकरण के कारण , गाँव हुए वीरान ।
भागे लोग शहर तरफ , मानें सुख का खान ।।१।।
शुद्ध जल-हवा गाँव के , आ रहे नहीं रास ।
शहर में जा बसने को , मानते हैं विकास ।।२।।
सब भाग रहे शहर को , सिरपर रखके पाँव ।
लोगों को भाते नहीं , वट-पीपल के छाँव ।।३।।
चिड़ियों के चहक से है , विहीन लगते गाँव ।
धेनु के रंभाना भी , काग के काँव-काँव ।।४।।
गायब सारे गाँव से , गौधन का गोठान ।
भाती नहीं लोगों को , कोयल की है तान ।।५।।
खाली लगते आजकल , गाँवों के चौपाल ।
गिल्ली-डण्डा न खेले , कोई नटखट लाल ।।६।।
आकर्षक लगते नहीं , गाँवों के परिवेश ।
शहर के प्रति लोगों में , चाहत किया प्रवेश ।।७।।
गाँव की है गरिमा को , लोग गये हैं भूल ।
शहर में बस जाने को , गये हैं सभी तूल ।।८।।
रिश्तों में शहरीकरण , लाया खूब दरार ।
होने लगे विलुप्त से , रस्म - तीज-त्योहार ।।९।।
मृगतृष्णा जैसे लगे , समझ से परे बात ।
प्रगति कहूँ इसे अथवा , विनाश का संघात ।।१०।।
शहरों में प्रदूषण का , लगता ज्यों अम्बार ।
पर्यावरण शहरों का , हुआ खराब अपार ।।११।।
देश का प्राण गाँव हैं , जीवन के आधार ।
मोह शहर का त्याग दो , कहे 'ठाकुर' विचार ।।१२।।
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व्याख्या -- शहर के आकर्षण एवं गाँव के वीरानगी
का वर्णन ।
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