Wednesday, June 10, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- शहरीकरण

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले',
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }'
विधा--दोहा छन्द ,
शीर्षक--'शहरीकरण का आकर्षण' ।

शहरीकरण के  कारण , गाँव    हुए   वीरान ।
भागे लोग  शहर तरफ , मानें सुख का खान ।।१।।
शुद्ध जल-हवा गाँव के , आ  रहे  नहीं  रास ।
शहर में  जा  बसने को , मानते  हैं   विकास ।।२।।
सब भाग रहे शहर को , सिरपर  रखके पाँव ।
लोगों   को  भाते  नहीं , वट-पीपल के  छाँव ।।३।।
चिड़ियों के चहक से है , विहीन  लगते  गाँव ।
धेनु   के   रंभाना    भी , काग के काँव-काँव ।।४।।
गायब   सारे   गाँव  से , गौधन  का   गोठान ।
भाती  नहीं  लोगों  को , कोयल की  है  तान ।।५।।
खाली लगते आजकल , गाँवों   के   चौपाल ।
गिल्ली-डण्डा  न खेले , कोई  नटखट  लाल ।।६।।
आकर्षक  लगते   नहीं , गाँवों   के   परिवेश ।
शहर के प्रति  लोगों में , चाहत  किया प्रवेश ।।७।।
गाँव  की  है गरिमा को , लोग  गये   हैं  भूल ।
शहर में  बस  जाने को , गये   हैं  सभी  तूल ।।८।।
रिश्तों   में  शहरीकरण , लाया   खूब   दरार ।
होने   लगे  विलुप्त  से , रस्म - तीज-त्योहार ।।९।।
मृगतृष्णा   जैसे    लगे , समझ  से  परे बात ।
प्रगति कहूँ इसे अथवा , विनाश  का  संघात ।।१०।।
शहरों   में  प्रदूषण का , लगता  ज्यों अम्बार ।
पर्यावरण   शहरों   का , हुआ  खराब अपार ।।११।।
देश  का  प्राण  गाँव हैं , जीवन   के  आधार ।
मोह शहर का त्याग दो , कहे 'ठाकुर' विचार ।।१२।।
                   ०××××××०
व्याख्या -- शहर के आकर्षण एवं गाँव के वीरानगी
               का वर्णन ।

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