Wednesday, June 17, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से नलिनी बाजपेयी कृत -संस्मरण

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी 
   जिला-कांकेर                                 
     विषय-संस्मरण
   शीर्षक-ब्लड कैंसर
  
       
      *ब्लड कैंसर*

    वार -बुधवार

        जीवन में कुछ बातें... कुछ घटनाएं भुलाएं नहीं भूलती।कोई साधारण सी घटना भी जीवन भर याद रहती है।इसी क्रम में यादों की पिटारा में एक बालिका की बहुत याद आती है।
       बात उन दिनों की है जब मैं हायर सेकेंडरी स्कूल में थी।मेरी पहुँच शाला के लगभग सभी बच्चों के पालकों के घर तक थी,क्योंकि मेरी नियुक्ति मेरे गृह ग्राम में ही थी।स्कूल में किसी मामले में  सामंजस्य बैठाने की बात हो या बच्चों के बीच  कोई गंभीर बात हो जाती तो घर तक जाकर मामला सुलझाने में मैं हमेशा तैयार रहती थी।
      उन्हीं दिनों एक लड़की स्कूल रोज विलम्ब से आती थी।मैं रोज कहती मगर वो ग्यारह बजे के बाद ही आती थी।एकदिन मैं उसे बाहर ही खड़ी रहने को बोली।वो खड़ी रही जब मैं कक्षा से निकलने लगी तो मेरे पास आकर रोतेे-रोते कहने लगी-"क्या करूँ मैडमजी घर का सारा काम करके आती हूँ।मेरे माता-पिता खूब लड़ते है।घर में छोटे-छोटे भाई-बहन है ।अगर खाना नहीं बनाऊँगी तो सब भूखे रह जाएंगे।"मुझे दया आ गई।मैं बोली- 'मैं तेरे घर जाऊँगी 'तो कहने लगी- 'आप मत जाइए मुझे डाँट पड़ेगी।'
         
     बहरहाल वो दसवीं पास हो गई।बड़ी चंचल थी।बात-बात में तुनक जाती थी।दो वर्ष बाद बारहवीं कक्षा में थी।प्रायोगिक परीक्षा में भी परीक्षक से उलझ गई।मैं ले देकर स्थिति संभाली।
      गर्मी की छुट्टियां हो गई थी।मेरी बहन की शादी हो रही थी।जहाँ मुख्य कार्यक्रम होना था ,वहाँ मैं खड़ी थी।वो वहाँ आई और कहने लगी-"मैडम जी आपने मुझे नहीं बुलाया।"मैं व्यस्तता का बहाना बनाई तभी बड़ी सहज और सरल भाव से कहने लगी-"मैडम जी आप मुझे देखने नहीं आए, मेरी तबीयत खराब है।"मैंने अनमने मन से पूछा--"क्या हुआ है तुझे?वह तपाक से बोलती है-ब्लड- कैंसर...मैं उसका मुँह देखते रही।बड़ी सरलता से कह गई मगर मैं शादी की व्यस्तता के बाद भी उसे भूला नहीं पाई या कहूँ आज तक नहीं भूला पाई।
       मुश्किल से दो माह बीता।उसकी तडप बढ़ती गई।किसी से खबर भेजी मुझसे मिलना चाहती है।स्कूल के दो मैडम के साथ मैं अस्पताल गई।बड़ी बेचैन थी।इधर -उधर बिस्तर में पलटती रही है।उस समय तक उसको आँख से दिखना भी बंद हो गया।उसी दिन शाम को उसकी मृत्यु हो गई ।मैं आज तक उसकी तुनक मिजाजी,और सरलता से बीमारी को बताने का तरीका नहीं भूला पाती।वो जेहन में बसी है।यदा-कदा उसकी याद आ ही जाती है।बहुत छोटी उम्र में घर की दायित्वों का बोझ लिए चली गई।

    नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)

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