बैकुंठपुर, जिला_ कोरिया
छत्तीसगढ़।
शीर्षक:- जीवन और आशा
विधा_संस्मरण
बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज में द्वितीय वर्ष की छात्रा थी ।
मेरा रुझान पढ़ाई के अलावा निबंध लेखन, भाषण,कविता, मंच संचालन, वार्ता , नाटक लेखन एवम् मंचन इत्यादि में हुआ करता था।
मैंने वहां राष्ट्रीय सेवा योजना में शामिल होकर बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया शायद इतना कि ओ मेरी जीवन में खुशी की पूंजी हो।
हमारे कॉलेज के एनएसएस टीम के तहत ग्राम लिब्रा, जिला सरगुजा को गोदग्राम लिया गया था जिसके अंतर्गत अगले पांच वर्षों तक उस ग्राम की स्वच्छता एवं सुविधाओं का ख्याल रखने की जिम्मेदारी थी। हमारी टीम वहां 15 दिनों के शिविर के लिए पहुंची थी जहां सौभाग्य से मुझे उस टीम का नेतृत्व करने का अवसर प्रदान किया गया था।
मैंने वहां सीखा कि किस तरह से
समूह कार्य से किसी भी बड़े कार्य को आसानी से खुश होकर किया जा सकता है, ऐसा कार्य जिसमें कोई थकान नहीं, ऐसा कार्य जिसमें कोई बहस नहीं केवल सहर्ष कार्य करने की धुन... सच बहुत ही यादगार लम्हें थे मेरे लिए ओ जो आज भी जीवंत हैं मुझमें।
शिविर के दौरान एक ग्रामीण परिवार ने हमसे परिचर्चा के दौरान एक व्यक्तिगत बात बताई और कहा कि हमारी इस समस्या का समाधान अवश्य कीजिए दीदी। जी हां, उस ग्राम में हमें ग्रामीण जनों के द्वारा एनएसएस दीदी की संज्ञा प्रदान किया गया था।
मुझे अच्छी तरह से याद है जब मैं और जया मेरी सखी पानी लाने नल गए थे तो एक पिता ने अपने मन की बात कही... कहा कि हमारा बेटा जब से शादी किया है तब से बहू के रहते न तो घर आता है और न ही बहू के हांथों का खाना खाता है उनके शादी को साल भर हो गए किन्तु आज भी मेरा बेटा अपनी पत्नी को न तो पत्नी मानता है और न ही उससे बात करता है।
हम दोनों उनकी बात सुनकर बहुत व्यथित हुए और उनसे पूछा कि आखिर क्यों ऐसा है? उन्होंने चुप्पी साध ली और वहां से चले गए जाते जाते अपने बेटे का नाम बताते गए कि मेरा बेटा शिविर के पास जाता है उसका नाम 'जीवन' है।
अगले दिन प्रांगण सफाई के दौरान जीवन से मुलाकात हुई जो हमारे साफ किए जगह को पुनः गंदा करने का काम कर रहा था जैसे गुटका का रैपर फेकना, इत्यादि । जब उनको मना किया गया तो बोले कि मै ऐसा ही करूंगा। दूसरे ग्रामीण भाई से पता चला कि वही जीवन है।
मै और जया बहुत हिम्मत करके उसके पास गए और गुजारिश के साथ एक पेड़ के नीचे बैठकर उनके मिजाज को शांत करते हुए उनसे बात करने की कोशिश की।
हमारा प्रयास सफल रहा जीवन ने धीरे धीरे स्वयं ही अपने व्यवहार के बारे में बताया कि किस तरह से ओ अपने घर वालो और अपनी पत्नी' आशा'से बेरुखी से पेश आता है। जीवन के द्वारा बताया गया कि किस तरह से उनके घर वाले बिन बताए ही मामा के घर घूमने गए एक बारहवीं कक्षा के लड़के का विवाह एक सातवीं पढ़ने वाली लड़की के साथ तय कर दिया गया। जीवन को मंडप गड़ने के बाद मामा के घर से यह कहकर लाया गया कि चलो घर में बहुत काम है, छानी फेरने का काम बचा हुआ है और जीवन घर आ गया जहां आने पर पता चला कि उसके विवाह का मंडप ही है जो उसके आंगन में गड़ा है।
जीवन ने आनाकानी की कि अभी उसे विवाह नहीं करनी लेकिन घर वाले नहीं माने कहा कि सब तय हो चुका है...... इस तरह चुप होकर जीवन ने घरवालों की इच्छा पूरी कर आशा के साथ विवाह कर लिया।
विवाह पश्चात जीवन ने आशा को अपने माता पिता को सौंप दिया यह कहकर कि आप लोग चाहते थे कि आशा यहां आए सो आ गई लेकिन मैं इसे अपनी पत्नी नहीं मानता अब आप लोग ही देखिए इसे। तब से लेकर आज तक ऐसा ही चलता आ रहा है ऐसा जीवन ने कहा और वह शांत हो गया
मैं और जया हम दोनों जीवन का जीवनी सुन दंग रह गए, मानो हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई हो। हम दोनों ने लंबी सांसें लीं और जीवन को समझाना शुरू किया और ये बताने की कोशिश किए कि जो भी हुआ उसमें उसकी पत्नी आशा की कोई गलती नहीं थी पर उसको सजा क्यों? माना कि तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ तुम पढ़ नही पाए, अपने सपने भी नहीं देख पाए लेकिन उन सब के लिए आशा को कुसुरवार ठहराना सही नहीं।
जीवन कुछ देर मौन ही रहा...
फिर अचानक से ही बोल पड़ा हां इसमें आशा की कोई गलती नहीं थी.. बेचारी आशा मैंने उसे बहुत तकलीफ़ दी है पता नहीं ओ मुझे माफ़ भी करेगी या नहीं...?
जया और मैंने जीवन को देखा और एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हुए कहा कि जीवन अभी भी देर नहीं हुई, जाओ और जाकर आशा से बात करो उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करो ...
जुदाई के इस लंबे समय अंतराल को विराम दो, अपनी चुप्पी को आवाज दो, एक दूजे को पति पत्नी होने का अधिकार और सम्मान दो। जाओ जीवन, जाओ.. इतना सुनते ही जीवन के आंखों में आंसू छलक आए, रूंवासे आवाज में उसने कहा एनएसएस दीदियों आप दोनों का बहुत धन्यवाद चलिए आप दोनों को साक्षी मान कर मैं अपने वैवाहिक जीवन का शुभारंभ करूंगा । हम तीनों जीवन के घर गए जीवन ने रास्ते में कुछ चॉकलेट खरीदे और हम घर पहुंचे।
जीवन ने आशा सुनती हो आशा कहां हो तुम? देखो तुमसे मिलने कौन आया है?
इतना सुनते ही आशा दौड़ते लड़खड़ाते, सांस फूलते, आंखों में आंसू छलकाते हम लोगों के पास आ कर खड़ी हो गई।
दोनों एक दूसरे को देखने लगे मानो कभी देखा न हो, दोनों के आंखों से आंसुओं के धार बहे जा रहे थे, हमने जीवन को इशारा किया उसने आंसू पोंछते आशा को चॉकलेट दिए और हमें भी।
जाओ आशा चाय बनाओ दीदियों के लिए और हमारे लिए भी आज सब मिलकर साथ में चाय पियेंगे तब तक जीवन के माता पिता भी वहां आ गए उनकी खुशी भी साफ साफ झलक रही थी, उनकी मां और पिता हमारे पैर छुने चाहे लेकिन हमने मना करते हुए उन्हें बधाई दी और समझाइश भी कि आप लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए था बालविवाह तो अपराध है ही उस पर बिन बताए बच्चों के साथ कोई भी कार्य नहीं कर सकते, इस जीवन में उनका भी हक है, फैसला का अधिकार उनको भी है.. इस तरह से जीवन के माता पिता को अपनी गलतियों का एहसास हुआ और जीवन को भी ......
इस तरह खुशी खुशी हम सभी वहां से चाय पीकर वापिस शिविर में आए और आकर अपने मैडम को पूरा किस्सा सुनाए। हमारी मैडम बहुत खुश हुईं और हमारी पीठ थपथपाई और कहा कि इतने कम उम्र में किसी के वैवाहिक जीवन की नैय्या को तुम दोनों ने डूबने से बचा लिया, खुश रहो।
इस तरह उनके जीवन में खुशी देखकर हमें अंतरात्मा से खुशी की अनुभूति हुई।
शिविर समाप्त होने के बाद भी जीवन धन्यवाद प्रेषित करने कॉलेज में आता रहता हमारी एनएसएस टीम को और 2 साल बाद एक नन्ही सी बिटिया जीवन के आंगन में जन्म ली।
मेरी खुशी का ठिकाना तब और नहीं रहा जब उन्होंने अपनी बिटिया का नाम"तारा"बताया।
मेरी आंखें भर आईं मैंने उन्हें बधाई दिया और सोचने लगी कि क्या मैंने कुछ ऐसा किया .......
सच में ये पल मेरे लिए अत्यंत ही अविस्मरणीय है, जब भी ये लम्हा याद आता है मन प्रफुल्लित हो उठता है, इसका श्रेय एनएसएस को ही जाता है ।
तारा पांडेय"मुक्तांशा"
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