Tuesday, June 30, 2020

रायगढ़ से अजय पटनायक की रचना- आधा तीतर आधा बटेर

रचनाकार- अजय पटनायक
स्थान- डोलेसरा, जिला- रायगढ़,छतीसगढ़
शीर्षक- आधा तीतर आधा बटेर
विषय- आधा तीतर आधा बटेर (मुहावरा) पर कविता

*आधा तीतर आधा बटेर*
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धर्म कर्म कठपुतली बने,मुखोटे पर दुनियादारी है।
सम्भल कर चलना दोस्तो,यहां हर शख्स एक मदारी है।
सेव भी ताकते रह जाते,बिक जाते बेर है।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

बेटी जींस में टिपटॉप ,बेटा बढ़ा लिया है बाल।
बीबी फरारी में घूम रही,पति घोट रहा है दाल।
कुत्ता रखवाली करता,तमाशा दिखाता शेर है।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

चोर घण्ट बजा रहा,साधु भोगता जेल।
खिलाड़ी नेता बन गये,संसद बन गया खेल।
खुशबु बाजार में बिक रहे,गन्धहीन चमेली कनेर है।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

रंग बदलती दुनिया,गिरगिट भी नाराज है।
आस्तीन में छुप दुश्मन बैठे,दोस्त शर्मिंदा आज है।
कौआ हंस की चाल चल रहा,कूकती पोपट मुंडेर है।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

मानव जहरीले हो गये, घर मे सो रहे है सांप।
माता शोहरत में खो गई,पैसा बन गया है बाप।
भटक रही है रिस्तेदारी,जानवर पल रहे है ढेर।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

बहुरूपिया न्याय मांग रहा,चौपट उसका धंधा है।
पंडित श्रोता बन गया,वाचक यहां हर बन्दा है।
असली चेहरा पहचान ले ,हो जाये ना देर।
दुनियादारी अंधेर है,आधा तीतर तो आधा बटेर है।।

             मौलिक रचना
          अजय पटनायक

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