Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के मुंगेली से नागेश कश्यप की रचना- मया

रचनाकार का नाम:- नागेश कश्यप
जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़) 
शीर्षक:- मया
विधा:- कविता

            मया

अही  मया  के  चिन्हा  संगी,
जिनगी   सुघ्घर    बने   रहै।
बिपत के कतको अँधरी आ जाये,
फेर खपरा कस धारी तने रहै।।

तोर मया के छँइहा म जोही,
जियत मरत ले तर जाहूँ मैं।
दगा झन देबे मोला ओ गोरी,
बिन  मारे   मर  जा  हूँ  मैं।।

मया नई चिन्है जात बिजात,
अऊ  मया के  ओर न  छोर।
मया मयारु  के एक्के बोली,
सदा  जिनगी  रहै  ये  तोर।।

मया नई देखे रंग रूप अऊ,
ऊँच  निच  वो  जानै  नही।
अपने  मन  के  करथे  बैरी,
बात कखरो वो मानै नही।।

मयारु एक झलक बर तोर,
का का  मैं  उदिम  करथौं।
घेरी  बेरी  तोर  खातिर  मैं,
कखरो मेरन लड़  मरथौं।।

मया के बोली मधरस जइसे,
बिन पिए ये गजब  मिठाथे।
रंग कोनो मेर दिखे नही अऊ,
आनी बानी के अजब दिखाथे।।

तोर  पिरित  के  मया  ह  गोरी,
जिनगी  भर   मोर   बने   रहै।
बिपत के कतको अँधरी आ जाये,
फेर खपरा कस धारी तने रहै।।

              नागेश कश्यप।।

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