जिला:- महासमुंद
शीर्षक :- प्रेम
पावन पावस सा निर्मल है,
निर्झर यह बहता है भाव,
दुनिया के इस भवसागर का,
प्रेम भाव है अद्भुत नाव।
प्रेयसी से बढ़कर इसकी,
जग में है एक परिभाषा,
बड़े - बड़े जंग फतह हो जाते,
बोलें जो प्रेम की भाषा।
प्रेम राग है, प्रेम योग है,
प्रेम नेह की शीतल छाया,
प्रेम तो है मन का मिलन,
नश्वर है यह मनु काया।
प्रेम मात से, प्रेम तात से,
प्रेम भाई बहनों में होती है,
जो देह भोग की उठे लालसा,
प्रेम अश्मिता खोती है।
कहे ये जोगी, जन - जन जाकर,
प्रेम भाव श्रृंगार करो,
त्याग क्रोध को इस जग में,
मन में सदा सद संस्कार भरो।।
व्याख्या:- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने प्रेम की पावन भाव को परिभाषित करते हुए कहा है कि प्रेम जग की बहुत ही सुन्दर अनुभूति है जो मानव जीवन में कई रिश्तों को जोड़ कर रखती है।
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