जिला:- महासमुंद
विधा :- चम्पू काव्य शैली
शीर्षक:- पंछी - पेड़ संवाद।
पंछी - पेड़ संवाद
एक नन्ही पंछी भोजन की तलाश में निकली हुई होती है। जेठ की तेज दुपहरी में गर्मी से बेहाल वह एक पेड़ पर आकर विश्राम करने लगती है। पंछी बहुत भूखी व प्यासी होती है। यह देख पेड़ पंछी से कहता है-
हे पंछी रानी, नभचर प्यारे,
खा लो थोड़ा आम,
भूख - प्यास संतृप्त होगी,
कर लेना फिर विश्राम।
पेड़ के इस दया भाव को देख कर पंछी भावविभोर हो जाती है और वृक्षराज से कहती है-
हे वृक्षराज भाव से आपके,
मैं सदा ही आभारी हूं,
आभार की आपने फल दिया,
मैं भूख - प्यास की मारी हूं।
आश्रय दिया यह जानकर कि,
मैं सफ़र से थकी - हारी हूं।
पंछी की बातें सुन पेड़ उत्साहित होकर अपने फल व छाया देने के स्वभाविक कार्य में छुपे खुद के हित व आपसी सौहार्द्र को व्यक्त करते हुए कहता है-
हे विहग मैं मदद करूं तो,
दिल में हर्ष होती है,
बोलो भला क्या एक हाथ से?
कभी भी ताली बजती है।
तुम खाती मेरे फल,
छाया में सुस्ताती हो,
फिर बीज लेकर के,
दूर तलक उसे उगाती हो।
मेरे वंश का विस्तार होता है,
एक दूजे से जुड़ा सारा संसार होता है।
पेड़ की बातें सुनकर और यह सुनकर कि आपसी सहयोग से ही संसार में समस्त जीवों का जीवन संभव है, पंछी मानव के कुकृत्य पर प्रकाश डालते हुए कहती है-
हे तरूवर आप तात समान हो,
भान मुझे है आपकी बातें,
पर हमने कोशिश कितनी की,
मनु को फिर भी न समझा पाते।
अगर मनु कुकृत्य त्यागकर,
ना पालन करे सद पंत,
ऐसे ही उजड़ेगी धरती,
होगा सृष्टि का अंत।
पर्यावरण दिवस आने पर मनु,
बस दिखावा दिखलाता है,
इस एक दिन के बाद भला कब,
वह विनाश से घबराता है।
यह सुनकर पेड़ भी व्यथित होकर पंछी से कहता है -
बात सही कहते हो पंछी,
जाने मानव किस मिट्टी का बना है,
बुद्धि का वरदान दिया उसे,
और सुन्दरता से जना है।
फिर अब तक धरती में,
बदलाव का उसे अहसास नहीं है,
कितनी विकराल होगी समस्या,
इस बात का उसे आभास नहीं है।
अंत में पंछी और पेड़ मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि-
अब भी समय है हे मनु,
अक्ल के घोड़े तुम दौड़ाओ,
वरना अंत निश्चित जग का,
थोड़ा तुम संभल जाओ।
No comments:
Post a Comment