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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- किसान
विधा -- गीत ( छत्तीसगढी़ )
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।।१।।
असाड़ महिना आगे संगी,बोए चलना धान ।
नांगर बईला धर के संगी,बोए चलना धान ।।
।।२।।
उमडे़ करिया बादर देखो,आँखी आंजे काजर।
रझरझा के गिरे ला पानी ,चलना गा किसान ।।
।।३।।
कमरा खुमरी लउठी धर ,तुतारी लेना हाथ मा ।
जांगर तोड़ मेहनत संगी , हरे तोर रे पहिचान ।।
।।४।।
चिऊं चिऊं चिरई बोले , कोयली मारे ताना ।
बबा खांसत डोकरा उठे,उठ हो गेहे बिहान।।
।।५।।
पाग बने धरे हे नांगर , बने चलही जांगर ।
जादा पानी मा लेटा धरे , धर ले धियान ।।
।।६।।
खेती के दिन ला संगी , बिरथा झन जावन दे।
दुख के पाछु सुख संगी , कहिथे जी सियान।।
।।७।।
मेहनत हम करबों संगी , धान ला उपजाबों ।
करबों मजा दिन बिताबों , सुन लेना मितान।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
पतोरा,छुरिया,राजनांदगाँव(छ.ग.)
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किसान - संक्षेप व्याख्या
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व्याख्या :--
प्स्तुत गीत के माध्यम ले मैं माटी पुत्र किसान के
वर्णन करे के एक छोटे से प्रयास करे हों ।
कइसे किसान हर घाम पानी बादर
ल नई देखे अउ सतत परिश्रम करथे अउ धरती
माता के सेवा करत धन्न , धान्य उपजाथे ।
किसान जग मा सबले महान हे ।
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Superb
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