जिला- रायगढ़(छत्तीसगढ़)
विधा- मुक्त छंद
शीर्षक-"संघर्ष"
भावार्थ-
बांसुरी की मधुर ध्वनि भी जब जयघोष करने वाले युद्ध में प्रयुक्त शंखों के साथ हो तो उसकी भी भावनाएं सुरीली आवाज से कर्कश ध्वनि की ओर हो जाती है जैसे वह भी युद्ध की हुंकार भर रही हो इस भाव को लेते हुए महाभारत के पात्रों के माध्यम से एक संदेश दिया गया है ।
*************************
" संघर्ष"
--------------------------------------
वीर खड़ा हो समर में या निहत्था म्यान पड़ा हो कमर में...
हो रहा युद्ध बिन हाथ के,निज संकल्प हो साथ के....
संघर्ष की बयार हो चली है मानो बांसुरी शंखनाद में पली है...२
**************************
जो हरण की व्यथा सिंघों संग,
वही मूषक की पीड़ा भुजंगों संग ।
यह उत्कोच नहीं परिणाम है,
यह उद्घोष नहीं संग्राम है ।
मरू में खग विहंग भी धैर्य खो रहे,
पीपासु राही निज शौर्य खो रहे...
कुपों-महासागरों में भी खलबली है....
संघर्ष की बयार हो चली है.......
**************************
वीणा की तान भी निशांत हो रहे,
प्रत्यंचा -घननाद भी अशांत हो रहे ।
पग पग में थपकियां जीना सिखाती हैं,
ठोकरें ही तो अस्तित्व पहचानती हैं ।
नन्हे कदमों से तो ममता सम्भली है...
संघर्ष की बयार हो चली है.....
**************************
वनवास राम को मिला,
विरह की ज्वाला सीता जी गई ।
प्रभु की लीला थी जन्म की,
दुख की प्याला देवकी पी गई ।
साथ हो कृष्ण तो युद्ध क्या?
प्रश्न है कि अभिमन्यु कैसे लड़ गया ।
बलवान सर्वत्र हैं पर कोई तो महाबली है....
संघर्ष की बयार हो चली है....
**************************
सामर्थ्य हो कृष्ण का फिर भीम का गदा क्या?
शक्ति तो घटोत्कच का सीना तर गया ।
पुत्र जो राजलिप्ती हो चला,
निज शिष्यों से युद्ध तो गुरु द्रोण कर गया ।
दिग्गज न टिकते सम्मुख जिसके,
इच्छा मृत्यु भी उसे शैय्या दे गया ।
संकल्प हो भीष्म का तो तीर भी तो मखमली है....
संघर्ष की बयार हो चली है....
**************************
दानी हो या महादानी,
आशीष तो कुंती पुत्र राधेय ले गया ।
मां को भी न निज मात कह सका,
निज अनुज से ही मृत्यु अनंत ले गया ।
वीर आए दानी आए,
कट गए वो अभिमानी आए ।
अश्रु नहीं रक्त से ही रण जली है...
संघर्ष की बयार हो चली है....
*************************
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
Anupam👌😊
ReplyDelete