पता - पेंडरवानी , बालोद ,छ. ग.
शीर्षक - गरीबी
गरीबी का दानव ग्रास बना ,
निगल रहा है जन- जन को ,
विपदा ने बेहाल किया ,
जग लूट रहे हैं निर्धन को ,
अपनेपन का जाल फेक ,
बांध दिया है आँचल को ,
झूठ फरेब में फ़ांस कर ,
गुलाम बनाया निर्बल को ,
आंसू को नित पीना है ,
और घुट-घुट कर ही जीना है ,
यह हाल अब भी है गरीब का ,
सब सहकर भी मुँह सीना है ,
जिनके हर अधिकार को ,
नित - नित कानून बनाये जाते हैं ,
गरीबी मिटाने हर सरकार ,
नये - नये योजना लाते हैं ,
मिटता नही गरीबी देखो ,
मिट जाता है गरीब ही ,
मेहनत की रोटी खाते फिर भी ,
कोई न होता करीब ही ,
नंगे तन अकुलाते बच्चे ,
निर्दयी समाज को न दिखता है ,
लूटने की परंपरा समाज का ,
समाज से ही सीखता है ,
कभी रोटी पाने बर्तन बिकते ,
कभी माँ स्वयं ही बिक जाती है ,
अपने लाल की भूख मिटाने ,
कभी स्वयं मिट जाती है ,
दोहरा चरित्र समाज का ,
पग - पग में परिलक्षित होता ,
हँसता मुख बस होर्डिंग में ,
शेष जीवन रोते बीतता ,
अंध खोह सी अंधकारमय ,
दिन -दिन कटता निर्धन का ,
विवशता और लाचारी ही ,
जीवन है हर निर्धन का ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
Very good yar
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