बैकुंठपुर, जिला_कोरिया छत्तीसगढ़।
आलेख
बलिदान जाया नहीं होने दूंगी.......
भारत माता की जय, भारत माता की जय, यह जय घोष चल ही रहा था कि अचानक 26 साल के नवजवान पुत्र का शव तिरंगे में लिपटे हुए, दिखाई देता है। मां की आंखें नम हैं, उसको खोने का भी गम है लेकिन फक्र से सीना चौड़ा भी है कि उसने वीर योद्धा बनकर दुश्मनों का सामना किया, भारत माता की रक्षा हेतु स्वयं का बलिदान कर दिया।
कुछ महीने पहले ही हांंथों में प्रीत की मेहंदी लगी थी, साजन के नाम की, सखियां अभी छेड़ ही रही थीं पिया के संज्ञान की
पर... पर पुनः मिलन कौन जानता था कि इस प्रकार होगा?
अभी जी भर कर देख भी नहीं पाई थी प्रियतम के रूप को
अभी महसूस भी नहीं कर पाई थी उनके छांव, उनके धूप को...
कि उनको देना भी था कुछ शुभ समाचार, देखना चाहती थी कि वो सुनकर कितने प्रफ्फुलित होते हैं, सोचकर उनकी टोपी अपने सर पे रख कर इतरा ही रही थी कि अचानक उनके चले जाने की ख़बर सुनाई दी।
दंग रह गई मैं, मन सुन्न हो गया..
हाय ये कैसे, क्या हो गया?
फिर से भारत माता के सम्मान के खातिर, अपने देश के स्वाभिमान के खातिर, देश के वीर सपूत के नाते, वफादार सैन्य महान, दुश्मनों के छक्के छुड़ाते, अपने सेना का जीत हो गया
देखो आज फिर एक जवान देश का शहीद हो गया।
शहीद जवान अमर रहे, भारत माता की जय।
क्या करें लोगों को दिखाते तो हैं कि हमें दुख नहीं बल्कि हमें फक्र है कि उसने अपना कर्तव्य निभाया, भारत वासी होने का फर्ज निभाया पर तकलीफ़ तो होती है अपने जिगर के टुकड़े को खोने का, अपना श्रृंगार, अपना प्यार, अपना सर्वस्व खोने का..
बेशक सम्मान मिलता है..
ये दुनिया, ये जहान मिलता है, केवल उसी की बदौलत, कि साथ तुम नहीं, तुम्हारा कर्तव्य है
मेरा मन अत्यंत दुखी और आहत है। मैं यह कैसे कहूं, नहीं कह सकती क्योंकि मैं एक वीर योद्धा एक शहीद की मां हूं, एक पत्नी हूं
नहीं दिखा सकती अपने दुख क्योंकि अब मैं भी एक वीरांगना हूं। मेरे आंखों में आंसू नहीं, देश के भविष्य के सपने सजे हैं, जिसे रोकर मैं मिटने नहीं दूंगी, उनके दिए बलिदान को जाया नहीं होने दूंगी। भारत माता की जय ।
तारा पांडेय" मुक्तांशा"
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