Wednesday, June 24, 2020

बिलासपुर से सावित्री यादव "सावि" की रचना- मुस्कुराना

रचनाकार  - सावित्री यादव "सावि"
                 बिलासपुर  छ. ग.
       


विधा _कविता  छंद मुक्त 
शीर्षक _ गरीबी मे मुस्कुराना 

ग़रीबी मे मुस्कुराना 

झूठे  सपनो मे जीते है |
फिर भी खुश रह लेते है |

अपनी झोपंड़ी को महल  महल कहते है  |
अपना दुख सहकर मुस्कुरा देते है |
हम गरीब -गरीब है |तो क्या संसाधन  पास नहीं, 
पर चेहरे की चमक है|अपनी, 
जो नहीं उसका गम खास नहीं |
झूठे सपनो मे जीते है |

बच्चो को यही समझाते खुश |
होकर जीना सीखाते, 
मेहनत करते रहना है |
हर पल हिम्मत से जीना है |
खाते हम बासी रोटी जैसे, 
वो पकवान  है |
झूठे सपनो मे जीते है |

हर दिन एक नया  सपना ले, 
जीवन की शुरुवात  करते है |
आँखों मे अास लिए फिर निकल पड़ते है |
जीने के लिए कमाने के लिए, 
झूठे सपनो मे जीते है |

कभी अपना मन मारकर |
तो कभी भूखे सोकर, 
उस ईश  पर भरोसा रखते है |
सब अच्छा  हो जाने की उम्मीद हम करते है |
झूठे सपनो मे जीते है |

जिस दिन मिलती है| हमको मेहताना |
ख़ुशी -ख़ुशी से झूम  उठते है |
सारी  जरूरते पूरी कर फिर, 
आस  नई  ले काम मे लग जाते है |
फिर से जीवन के काज समेट कर |
गुजर बसर हम करते है |
झूठे सपनो मे जीते है |


भावर्थ _ गरीब हर हाल मे खुश होना चाहता है |
          रचनाकार  _सावित्री यादव "सावि "
               

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