बिलासपुर छ. ग.
विधा _कविता छंद मुक्त
शीर्षक _ गरीबी मे मुस्कुराना
ग़रीबी मे मुस्कुराना
झूठे सपनो मे जीते है |
फिर भी खुश रह लेते है |
अपनी झोपंड़ी को महल महल कहते है |
अपना दुख सहकर मुस्कुरा देते है |
हम गरीब -गरीब है |तो क्या संसाधन पास नहीं,
पर चेहरे की चमक है|अपनी,
जो नहीं उसका गम खास नहीं |
झूठे सपनो मे जीते है |
बच्चो को यही समझाते खुश |
होकर जीना सीखाते,
मेहनत करते रहना है |
हर पल हिम्मत से जीना है |
खाते हम बासी रोटी जैसे,
वो पकवान है |
झूठे सपनो मे जीते है |
हर दिन एक नया सपना ले,
जीवन की शुरुवात करते है |
आँखों मे अास लिए फिर निकल पड़ते है |
जीने के लिए कमाने के लिए,
झूठे सपनो मे जीते है |
कभी अपना मन मारकर |
तो कभी भूखे सोकर,
उस ईश पर भरोसा रखते है |
सब अच्छा हो जाने की उम्मीद हम करते है |
झूठे सपनो मे जीते है |
जिस दिन मिलती है| हमको मेहताना |
ख़ुशी -ख़ुशी से झूम उठते है |
सारी जरूरते पूरी कर फिर,
आस नई ले काम मे लग जाते है |
फिर से जीवन के काज समेट कर |
गुजर बसर हम करते है |
झूठे सपनो मे जीते है |
भावर्थ _ गरीब हर हाल मे खुश होना चाहता है |
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
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