Friday, June 26, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- नशा मुक्ति

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-नशाखोरी मुक्त समाज
अलंकार-सभंग यमक
शीर्षक- "नशा मुक्त समाज"
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नशा नाश है कलंक है,
नशा मुक्त समाज का करो गुणगान ।
तुम समाज से नहीं समाज तुमसे है,
समाज का जीवित रहे यह विज्ञान ।।
जीवन घट घट कर घट रहा है,
मौत के दरबार में हांक लगाएगा दरबान ।
डगमग डगमग चलता है
डगर में वही बूढ़ा दीवान ।।
पन्नाधाय सा न कर सकोगे तुम
वही राजतिलक का वैसा दीपदान ।
भंग भांग धतूरा शिव को सोहे,
हलाहल धारी नीलकंठ महान ।।
जो स्वयं शिव हो जाओ तो,
कैसे सहोगे कालचक्र का पाद प्रतिष्ठान ।
नशा से न पिता का सम्मान,
न *मॉं न* कोई मॉं का *मान* ।।
*मर* कर *घट* गए यहीं *मरघट* पर,
अब बस सूना है जहान ।
नशे में *खा कर* पी कर *खाक* में मिल जाओगे,
बार-बार बताता रह गया श्मशान ।।
का काम का अंजाम,
धुएं में मिट गया नामोनिशान ।
नरोत्तम अवतरित हुए थे,
देख दशा हुए अंतर्धान ।।
अभी पका था फसल अब खाली है खलिहान ।
नशा नाश ही करता है,
पत्नी बेटी बहन सब दिखाता एक समान ।।
शिव शक्ति के वंशज तुम,
स्वयं में शिव का करो अनुसंधान ।
नशे में इतना गुमान अच्छा नहीं,
बिखरते बिखरते बिखर गया  इंसान ।।
सर्व पाप का वहन करती है यह धरा,
तुम ही हो यहां के ऐश्वर्यवान ।
दर्प अहम में जीने वाले,
कब्र से ताक रहे कब्रिस्तान ।।
बिलख बिलख कर रोई थी सैरंध्री,
कब तक गाऊं महाभारत का व्याख्यान ।
नशा पाप नहीं महापाप है,
विनती करूं नशे का नाश करो सुजान ।।

गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"✍

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