रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव(छ.ग.)
शीर्षक -- "झांसी के रानी "
विधा -- छंद मुक्त कविता
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झांसी के रानी
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ये तो अमर कहानी ऐ ,
झांसी वाली रानी ऐ ।
बचपन म मनु नाम रहे,
ये तो विहि सयानी ऐ ।।
जनम धरिन 19 नवं.1835 में
जगह वाराणसी भदैनी ।
नाम मणिकर्निका नाम धरे ,
मनु रिहिस स्वाभिमानी ।।
मोरोपंत तांबे बाप एकर ,
भागीरथी बाई माता रानी जी।
बचपन ले शास्त्र के शिक्षा संग ,
शस्त्र शिक्षा घलो पाईन जी ।।
सात साल के नाजुक उमर म ,
1842 में बिहाव होईस ।
झांसी के राजा गंगाधर राव ,
पति राजा वीर ये पाईस।।
अब लक्ष्मी बाई मनु नाव होगे,
1851 में बच्चा जनम दीस ।
चार महिना में काल होगे ।
जीना गजब दुभर होगिस।।
1853 म गंगाधर बीमार परिस ,
एक झन बेटा दत्तक लिस।
तेकर नाव धरे दामोदर राव ,
विहि साल मरे गंगाधर राव।।
अंग्रेज दामोदर नई स्वीकार करिन
रानी पेंशन ल नई स्वीकार करिन
रानी लक्ष्मी रानीमहल वास करिन
आगी विरोध के अबभड़क उठिस
विद्रोही मन ले रानी मिलिस ,
बागी मन चौउदा हजार रिहिस
अंगरेज के तब छक्के छुटिस ,
बागी सेना सब भड़क उठिस ।।
अंगरेजन के ईंट ले ईंट बजादिन ,
1857 के लक्ष्मी मरदानी।
गजब लडि़स मस्तानी ,
लक्ष्मी झांसी वाली रानी।।
जब तक रिहिस परान सांस मे ,
तब तक रानी लक्ष्मी लड़त रिहिस
आखिर रानी अंगरक्षक ले बोलिस
मन के बात ल रानी रक्षक बोलिस
जब तक रिहिस परान सांस म
अंगरेज ले मैं गजब लडे़ हों।
तन मोर झन फिरंगी धरे ,
रानी कही अपन परान तजे ।।
अंगरक्षक करिस लकडी़ एकट्ठा ,
लक्ष्मी बाई के चिता जरा दिस ।
ढे़र करिस सब बागी ल फिरंगी ,
बागी मन अपन जान गवां दिस।।
ये तो लक्ष्मी बाई के कहानी ऐ,
भूला सकन न जेला हमन ।
वीरांगना विहि बलिदानी ऐ ,
ये तो झांसी वाली रानी ऐ ।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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व्याख्या :---
प्रस्तुत सम्पूर्ण कविता में हमनें
वीरांगना महारानी झांसी की रानी
लक्ष्मी बाई की वीरता , शौर्य का
वर्णन संक्षेप औरत्र सारगर्भित रुप
में करने का प्रयास किया है ।
बहुत सुन्दर कविता ठाकुर साहब
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