Thursday, June 4, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- झांसी के रानी

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रचनाकार  -- प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला       --  राजनांदगाँव(छ.ग.)
शीर्षक      -- "झांसी के रानी "
विधा         -- छंद मुक्त कविता 
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            झांसी के रानी 
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ये  तो अमर कहानी ऐ , 
                 झांसी वाली रानी ऐ ।
बचपन म मनु नाम रहे,
              ये तो विहि सयानी ऐ ।।

जनम धरिन 19 नवं.1835 में    
           जगह  वाराणसी  भदैनी ।
नाम मणिकर्निका नाम धरे ,
         मनु  रिहिस  स्वाभिमानी ।।

मोरोपंत तांबे बाप एकर ,
      भागीरथी बाई माता रानी जी।
बचपन ले शास्त्र के शिक्षा संग ,
     शस्त्र  शिक्षा घलो पाईन जी ।।

सात साल के नाजुक उमर म ,
         1842  में  बिहाव होईस ।
झांसी के राजा गंगाधर राव  ,
         पति राजा  वीर ये पाईस।।

अब लक्ष्मी बाई मनु नाव होगे,
       1851 में बच्चा जनम दीस ।
चार महिना में काल होगे ।
        जीना गजब दुभर होगिस।।

1853 म गंगाधर बीमार परिस ,
       एक  झन बेटा  दत्तक लिस।
तेकर नाव धरे दामोदर राव ,
      विहि साल मरे गंगाधर राव।।

अंग्रेज दामोदर नई स्वीकार करिन
रानी पेंशन ल  नई स्वीकार  करिन
रानी लक्ष्मी रानीमहल वास करिन
आगी विरोध के अबभड़क उठिस

विद्रोही मन  ले रानी  मिलिस ,
  बागी मन चौउदा हजार रिहिस
अंगरेज के तब छक्के छुटिस ,
  बागी सेना सब भड़क उठिस ।।

अंगरेजन के ईंट ले ईंट बजादिन ,
          1857  के लक्ष्मी मरदानी।
गजब लडि़स मस्तानी ,
          लक्ष्मी झांसी वाली रानी।।

जब  तक  रिहिस  परान सांस मे  ,
तब तक रानी लक्ष्मी लड़त रिहिस
आखिर रानी अंगरक्षक ले बोलिस
मन के बात ल रानी रक्षक बोलिस

जब तक रिहिस परान सांस म 
   अंगरेज ले  मैं  गजब  लडे़  हों।
तन  मोर  झन  फिरंगी धरे ,
    रानी कही अपन परान तजे ।।

अंगरक्षक करिस लकडी़ एकट्ठा ,
लक्ष्मी बाई  के चिता जरा  दिस ।
ढे़र करिस सब  बागी ल  फिरंगी ,
बागी मन अपन जान गवां  दिस।।

ये तो लक्ष्मी बाई के कहानी ऐ,
         भूला सकन न जेला हमन ।
वीरांगना विहि बलिदानी ऐ ,
       ये तो झांसी वाली  रानी ऐ ।।

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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर
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व्याख्या  :---
     प्रस्तुत सम्पूर्ण कविता में हमनें
वीरांगना महारानी झांसी की  रानी
लक्ष्मी बाई  की  वीरता , शौर्य  का
वर्णन संक्षेप औरत्र सारगर्भित रुप
में करने का प्रयास किया है ।

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर कविता ठाकुर साहब

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