स्थान--सारंगढ़
जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा छन्द , शीर्षक-'महान सन्त कबीरदास
जीवन भर कबीर किये , दिखावे का विरोध ।
बाँटते रहे देश में , लोगों में है बोध ।।१।।
जाति-वर्ण व्यवस्था की , रहे विरोधी घोर ।
अंधविश्वास मिटाने , दिये हमेशा जोर ।।२।।
सादा जीवन जिये थे , रखके उच्च विचार ।
दूर थे वे वैभव से , भरे नहीं भण्डार ।।३।।
धन को है महा ठगनी , कह देते थे ज्ञान ।
उसके पीछे न दौड़े , मानते तृण समान ।।४।।
कभी भेंट किसी की वे , किये नहीं स्वीकार ।
जीवन अभावपूर्ण है , कबीर दिये गुजार ।।५।।
हिन्दू-मुगल दोनों को , दिये खूब फटकार ।
स्वर्ग पहुँचाने का वे , रहे न ठेकेदार ।।६।।
मोक्ष की चाह नहीं थी , किये न अंगीकार ।
स्वर्ग का टिकट न बेचे , नहीं किये व्यापार ।।७।।
मूर्ति अथवा प्रतीक की , पूजापर प्रतिकार ।
धार्मिक दिखावेपर वे , करते रहे प्रहार ।।८।।
मगहर में कबीर पहुँच , किये बसेरा - ठान ।
बिना पूजा पाठ किये , पाये पद निर्वाण ।।९।।
मनुज जहाँ मरे न तरे , लोगों का विश्वास ।
उसको तोड़ कबीर जी , पाये स्वर्ग निवास ।।१०।।
उनका पार्थिव देह है , बना पुष्प का ढेर ।
हिन्दू-मुगल बाँट लिये , किये नहीं वे देर ।।११।।
'ठाकुर' आज भरे पड़े , कबीर के अवतार ।
सब को स्वर्ग पहुँचाते , बनकर ठेकेदार ।।१२।।
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