Thursday, June 4, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले' की रचना- महान सन्त कबीरदास

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़
जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा छन्द , शीर्षक-'महान सन्त कबीरदास                       






जीवन भर कबीर किये , दिखावे का विरोध ।
बाँटते    रहे    देश    में , लोगों  में   है  बोध ।।१।।
जाति-वर्ण व्यवस्था की , रहे   विरोधी   घोर ।
अंधविश्वास      मिटाने , दिये   हमेशा   जोर ।।२।।
सादा  जीवन  जिये  थे , रखके उच्च विचार ।
दूर   थे   वे   वैभव   से , भरे  नहीं   भण्डार ।।३।।
धन को है  महा  ठगनी , कह   देते  थे  ज्ञान ।
उसके   पीछे   न   दौड़े , मानते  तृण समान ।।४।।
कभी भेंट किसी की वे , किये नहीं  स्वीकार ।
जीवन  अभावपूर्ण   है , कबीर  दिये  गुजार ।।५।।
हिन्दू-मुगल   दोनों  को , दिये खूब फटकार ।
स्वर्ग   पहुँचाने   का  वे , रहे    न    ठेकेदार ।।६।।
मोक्ष की  चाह  नहीं थी , किये  न अंगीकार ।
स्वर्ग का  टिकट न बेचे , नहीं  किये व्यापार ।।७।।
मूर्ति अथवा प्रतीक की , पूजापर   प्रतिकार ।
धार्मिक   दिखावेपर  वे , करते   रहे   प्रहार ।।८।।
मगहर में  कबीर  पहुँच , किये बसेरा - ठान ।
बिना  पूजा  पाठ  किये , पाये  पद  निर्वाण ।।९।।
मनुज जहाँ  मरे  न  तरे , लोगों  का विश्वास ।
उसको तोड़  कबीर जी , पाये स्वर्ग  निवास ।।१०।।
उनका  पार्थिव   देह  है , बना पुष्प  का ढेर ।
हिन्दू-मुगल  बाँट  लिये , किये  नहीं  वे  देर ।।११।।   
'ठाकुर' आज  भरे  पड़े , कबीर के  अवतार ।
सब को  स्वर्ग  पहुँचाते , बनकर     ठेकेदार ।।१२।।
                       ०×××××०

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