जिला-कांकेर
शीर्षक - चाँद
*चाँद*
निरभ्र विस्तृत नभ में,
ज्योत्सना फिसल गई।
धरती तलक व्योम में,
उजास छवि भर गई।
धवल चाँद रत्नाकर पर,
रंग अनोखा भर गई।
तिमिर हरण करने को
संसृति तक बिखर गई।
चाँद-तारों से स्वप्निल,
इंद्र धनुषी गागर भर गई।
आँगन चन्दन वन होकर,
केसर वन सा महक गई।
स्निग्ध चाँदनी शीत वन
बन और निखर गई।
दूर खड़ी लिए श्वेत रंग
क्षितिज से उभर गई।
गगन पथ में इंदु किरण,
बन सारथी उतर गई।
चारू चन्द्र की कीर्ति,
भुवन पर फहर गई।
नई नवेली अभिसारिका
रात उसकी संवर गई।
मगर ये क्या चाँदनी को,
खग्रास पूरा निगल गई।
देखकर आँखें पथराई,
छाती चकवा की धसक गई।
तन विरही मन विरही,
देख तुम्हें मुकर गई।
प्रियतमा बनी बावरी,
चाँद किरण से डर गई।
बदला रंग तुम्हारा देख,
मैं जीते जी मर गई।
फिर तुम्हारा आना,
बादलों का छा जाना।
घनघोर घटाओं के बीच,
बिजली बन उतर गई।
व्याख्या-प्रस्तुत कविता में चाँद की सुंदरता,बादलों के बीच छुप जाना और बिजली बनकर निकलना,प्रकृति के अन्य जीव-जंतुओं पर उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, ((छ. ग.)
No comments:
Post a Comment