जिला-कोरबा छत्तीसगढ़
विधा-कविता ,छंद मुक्त
शीर्षक-पिंजरे की शेरनी
प्रस्तुत है कविता--
शेरनी हूँ मैं पिंजरे की।
नायिका हूँ मैं ग्रंथों की।
कर्ज दार हूँ मैं ईश्वर की ।
इसलिए मजदूरन हूँ मैं संसार की ।
अजीब विडंबना है मेरी हैशियत का,
छूट रही हूँ कर्ज यहाँ पर,
फिर भी लक्ष्मी हूँ तिजोरी की ।
अपनी हैशियत का अंदाजा मैं ही जानूँ,
पर क्या करूँ ;
शेरनी हूँ मैं पिंजरे की।
।।इति ।।
ब्याख्या--प्रस्तुत कविता में रचनाकार एक नारी की विवशता का वर्णन कर रही है किस तरह नारी शक्तिशाली होते हुए भी बंदिशों के घेरे में रहती है ।
गोमती सिंह
कोरबा छत्तीसगढ़
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शेरनी जो पिंजरे के रहती है वह और् खूंखार होती है। जब वह आजाद होती है तो उसके ताकत कक अंदाजा नही होता।बेहद सूंदर रचना।
ReplyDeleteKya baat hai
ReplyDeleteशेरनी पिंजरे में रहे या आजाद उसका मान कहीं कम नहीं हो सकता, बंदिशों के घेरे में भी वह अपना मान कम होने नहीं देती। बहुत सुंदर रचना 👌
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