Saturday, June 13, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुंद से द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- लहुट के आ जाबे

द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़  
शीर्षक;"लहुट के आ जाबे"
विधा-गीत(छत्तीसगढ़ी)
                 ***** 
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा । 
सकलाए गाँव गुड़ी म सुमत के डेरा ।। 

पुन्नी के अंजोर रतिहा म , 
       अंधियारी अंजोरी खेलयँ। 
पारा के जम्मों मनखे मन, 
        निहोरयँ जीवरा जुड़ोवयँ।।
आही उही दिन बादर तोर हे अगोरा ,
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा । 

संझा बइठे चौंरा म जम्मों , 
     महतारी अउ बहुरिया मन । 
दुख पीरा ल अपन जीव के , 
     गोठियावयँ जुरमिल सबों झन ।। 
लागय ठउर-ठउर जस महतारी के कोरा , 
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा ।

परय बिपत गा कोनों ल , 
      जम्मों जुरियाए निहोरयँ । 
होवयँ झन कोनों सपुरहा , 
     मया अदलहा सगरो के जोरयँ ।। 
करके बुता जम्मों घर आवयँ अबेरा,
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा।
सकलाए गाँव गुड़ी म सुमत के डेरा ।।
                 ******
               द्रोपती साहू "सरसिज"
               

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