महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"लहुट के आ जाबे"
विधा-गीत(छत्तीसगढ़ी)
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लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा ।
सकलाए गाँव गुड़ी म सुमत के डेरा ।।
पुन्नी के अंजोर रतिहा म ,
अंधियारी अंजोरी खेलयँ।
पारा के जम्मों मनखे मन,
निहोरयँ जीवरा जुड़ोवयँ।।
आही उही दिन बादर तोर हे अगोरा ,
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा ।
संझा बइठे चौंरा म जम्मों ,
महतारी अउ बहुरिया मन ।
दुख पीरा ल अपन जीव के ,
गोठियावयँ जुरमिल सबों झन ।।
लागय ठउर-ठउर जस महतारी के कोरा ,
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा ।
परय बिपत गा कोनों ल ,
जम्मों जुरियाए निहोरयँ ।
होवयँ झन कोनों सपुरहा ,
मया अदलहा सगरो के जोरयँ ।।
करके बुता जम्मों घर आवयँ अबेरा,
लहुट के आ जाबे जुन्ना नंदाए बेरा।
सकलाए गाँव गुड़ी म सुमत के डेरा ।।
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द्रोपती साहू "सरसिज"
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