स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छंदमुक्त
शीर्षक -"माई"
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एक भिखारन अति सयानी
आई चौखट हाथ फैलाई
कुछ खाने को दे- दे माई
हाथों में लगा था आटा
मुझको कुछ सूझा ना भाई
दौड़ के दो रोटी ही ले आई
दिन बीते और बीते महीने
आने लगी अब तो हर महीने
हर दो दिन में अब आती-जाती
ले बलाएँ दुआएं दे जाती
दिन ऐसे ही बीतने लगे
जो ना आए तो जी घबराए
मुझे भी उसकी आदत पड़ गई
दिया ना रोटी तो भूखे सो गई
एक दिन सुबह से शाम हुई
वह ना आई रात गई
दूजा दिन भी निकल गया
तीजा दिन भी बीत गया
अब तो धीरज टूट गया
देखने उसके घर चली गई
घर में मुझको मिला न कोई
ना ही उसकी मिली परछाई
तभी दौड़ के आया पड़ोसी
बोला वह हुई स्वर्गवासी
मेरी आंखें नम हो गई
वह बोला क्या तुम ही हो माई
इंतजार मैं कर ही रहा था
उसकी अमानत लिए खड़ा था
ये लो सौंपा उसकी अमानत
मेरे सिर एक बोझ बड़ा था
मैं तो कुछ समझ ना पाई
दौड़ी - दौड़ी धर ले आई
डिब्बा खोला देख हुई हैरानी
इतना पैसा दे बन गई दानी
था एक कागज का टुकड़ा
उसमें झलका उसका मुखड़ा
मुखड़े से एक आवाज आई
मेरा तो कोई ना था अपना
तू ने मुझे अपनाया माई
तुझे दे दी अपनी सारी कमाई
ओ ....माई ओ... माई
तुझे सुखी सदा रखे साईं।
Heart touching lines
ReplyDeleteSuper writer
ReplyDeleteBahut Khub Didi Ati Uttam
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