Saturday, June 27, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- कब जागोगे मानव

रचनाकार -उर्मिला सिदार
 जिला- रायगढ़ 
विधा- कविता 
शीर्षक-" कब जागोगे मानव"

       "कब जागोगे मानव" 

 आज की परिस्थिति बदत्तर है,
 कल की परिस्थितियांँ कैसे संभालोगे।
 ज्ञान अवस्था की इकाई हो मानव,
तुम ज्ञान को कब पहचानोगे। परिस्थितियां बनती नहीं जिंदगी में, 
परिस्थितियाँं कर्मों से बनाई जाती है,
 परिस्थितियांँ का हालात पता चलने से,
वह आपस में संवाद से सुलझाए जाती है।
 अपने पराए की दीवार से तुम, कब तक निजात हो पाओगे,
छल , द्वेष ,घृणा से जीना नहीं बनता,
 कब प्रेम भाव जगा पाओगे।
 समझने के लिए आए हो मानव, जरा समझने में मन लगाओ, समझे बिना जीना नहीं बन रहा है,
 जरा चिंतन में मन लगाओ।
 आज तक  स्वयं को समझ नहीं पाया,
 तो तुम औरों को क्या समझ पाओगे,
 खुद को समझे बिना मानव,
 तुम प्रकृति में कैसे जी पाओगे।

 व्याख्या- इस कविता में कवित्री  अमानवीयता से मानवीयता की ओर जाने के लिए प्रेरित किया है।

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