रचनाकार -- गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला -- रायगढ़ (छ.ग.)
शीर्षक -- " कृषक"
विधा -- छंद मुक्त
अलंकार -- यमक अलंकार
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किसी किसान के अक्षर से,
वयोवृद्ध अक्षर का गुणगान ।
अम्बर जो प्रस्वेदमय हुआ,
खुला अंबर ने लिया पहचान ।।
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गिरा अभ्र से अमृत ऐसा,
अमृत उपजे उपजाऊ धरा से ।
नव पल्लवित नन्ही कली खिल रही,
खिल रहा भाग्य सुप्त यशोधरा से ।।
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हलधर तेरी कैसी अवस्था,
जन्मती जमीं पर अवस्था बीत गई।
मेहनत का प्रस्वेद ऐसा बहा,
कि बिन लड़े ही भाग्य जंग जीत गई ।।
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धन्य-धन्य है उत्सर्ग तुम्हारा,
धन्य उत्सर्ग वसुंधरा को ।
सहने को तो हर दुख सहा,
न मिला उत्सर्ग किसी अधमरा को ।।
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बंजर मरु से अन्न उगाना,
नहीं सहज कोई काम ।
काम क्रोध सब त्याग कर,
करो मात धरा को प्रणाम ।।
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"यमक अलंकार विशेष":
1.अक्षर=तपस्या, भगवान,
2.अम्बर=कपड़ा, आसमान
3.अमृत=जल, अन्न
4.खिल=खिलना,उगना
5.अवस्था=स्थिति, समय,
6.उत्सर्ग=त्याग,दान,समाप्ति
7.काम=कार्य, वासना
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गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"
Superb .... 👌👌👌
ReplyDeleteThank you awdhesh bhai...
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