स्थान-सारंगढ़ , जिला-रायगढ़
विधा-दोहा छन्द
शीर्षक-'धरती के भगवान किसान'
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धरती के भगवान हैं , हमारे सब किसान ।
खेतों में कर मेहनत , फसल उगाते जान ।।१।।
वर्षा-शीत - ताप सहें , होते धीरजवान ।
वर्षा में भीगते हैं , कीचड़ सहें समान ।।२।।
शीत की झोंके को है , सहते दे मुस्कान ।
गर्मी की तपन को ये , झेलते नियति जान ।।३।।
पसीना तन से बहता , रोम-रोम प्रति मान ।
पूजक हैं परिश्रम के , कृषि होती पहचान ।।४।।
करके कठोर मेहनत , करते अन्न प्रदान ।
खेत इनके मंदिर हैं , गिरिजाघर भी जान ।।५।।
गुरुद्वारे - मस्जिद रहे , श्रम होता भगवान ।
खेतों में काम करना , पूजा - पाठ समान ।।७।।
इनके तीरथ - धाम हैं , खेत और खलिहान ।
प्रति रोज दर्शन करते , होते साँझ - बिहान ।।८।।
हल-बैल उनके साथी , खेत हैं जी - परान ।
अन्न उगाना धर्म है , उपासना यह जान ।।९।।
जगती का अन्नदाता , करता क्षुधा निदान ।
पेट पालता सभी का , श्रम का दे बलिदान ।।१०।।
रात-रात भर जागके , फसल बचाये धान ।
कर्ज लेके कभी-कभी , जब हुआ परेशान ।।११।।
तब आत्महत्या करके , छोड़ जाता जहान ।
करे नमन'ठाकुर' उन्हें , होते कृषक महान ।१२।।
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